गीली ओंस बूंद

फाल्गुनी

स्मृति आदित्य|
ND
सूखी हुई टहनी पर
टंगी
गीली ओंस बूंद की तरह,
टंगी है
मेरी उम्मीद की
थरथराती अश्रु-बूंद
तुम्हारे जवाब के इंतजार में,

धवल चांदनी गुजर गई
और ठिठक गई है भोर,
कांप रही है अब भी
मेरी आशा की डोर,
आदित्य-रश्मियों से
जगमगा उठी नाजुक ओंस बूंद,
लगा जैसे नाच उठा
लरजती आस का नीला मोर..



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