हमारा लोकतंत्र और हिन्दी

WDWD
यूँ तो अनुच्छेद 343 (1) में हिन्दी को संघ की भाषा बनाया गया है। फिर इसे गति देने के लिए राजभाषा अधिनियम-1963 बनाया गया है। पर इन कागजी घोड़ों के दौड़ाने के बावजूद हिन्दी का घोड़ा, क्षिप्र गति से ही आगे बढ़ रहा है 'वेस्ट मिनिस्टर सिस्टम' संसदीय व्यवस्था पर लगातार हावी रहा है।

मुझे इस बात से कतई गिला-शिकवा नहीं है कि अँग्रेजी क्यों पढ़ी-पढ़ाई जा रही है। अंतत: अँग्रेजी देशवासियों के लिए ज्ञान की खिड़की खोलती है; उन्हें ज्यादा सोचने-समझने का अवसर प्रदान करती है। दुनिया भर के लोगों से संवाद का माध्यम है अत: अँग्रेजी पढ़ी-पढ़ाई जानी चाहिए।

  भारत, रूस, कनाडा जैसे विशाल और बहुभाषी देशों की अपनी भाषाई समस्याएँ हैं। 'पेरेस्गाइका' और 'ग्लासनोस्त' के पूर्व वाले वर्षों में तत्कालीन सोवियत संघ में ढेर सारी भाषाएँ बोली जाती हैं। कनाडा में आज भी, फ्रेंच व अँग्रेजी दोनों बोली-समझी जाती है।      
पर जब अँग्रेजी, हिन्दी को प्रतिस्थापित कर ऊँचे सिंहासन पर बैठने लगती है तो आत्म ग्लानि होने लगती है। मलयालम के प्रसिद्ध कवि वल्लतोल नारायण मेनन के अनुसार मातृभाषा माँ होती है तो अन्य भाषा मौसी, मौसी अच्छी तो होती है पर माँ का स्थान कदापि ग्रहण नहीं कर सकती।

विश्व की एक समृद्ध भाषा के रूप में अँग्रेजी नि:संदेह रूप से आदर की पात्र है, पर भारतीयों के मानसिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, व्यापारिक व न्यायिक हितों के संवाहक के रूप में वह भारतीयों की भाषा कदापि नहीं बन सकती और अँग्रेजी को लगातार इतना ऊँचा स्तर दिया जाता रहा तो वह जनतंत्र के अवमूल्यन के अलावा कुछ नहीं है।

भारत, रूस, कनाडा जैसे विशाल और बहुभाषी देशों की अपनी भाषाई समस्याएँ हैं। 'पेरेस्गाइका' और 'ग्लासनोस्त' के पूर्व वाले वर्षों में तत्कालीन सोवियत संघ में ढेर सारी भाषाएँ बोली जाती हैं। कनाडा में आज भी, फ्रेंच व अँग्रेजी दोनों बोली-समझी जाती है। पर इन देशों ने दूसरों की भाषा नहीं अपनाई। अपनी ही भाषा को पल्लवित, पुष्पित, विकसित कर महाशक्ति के रूप में तब्दील हुए हैं। तो भारत में क्या परेशानी है? शायद कमी है धुन की, जुनून की, इच्छाशक्ति की।

एक अँग्रेजी भाषी अल्पसंख्यक वर्ग, बहुसंख्यक वर्ग पर अपनी सत्ता जमाए रखने के लिए अँग्रेजी को लाठी की तरह इस्तेमाल कर रहा है और हिन्दी वाले निरीह भेड़-बकरियों की तरह धकियाए जा रहे हैं, हड़काए जा रहे हैं। अँग्रेजी में पढ़ने वाले अपने आपको तीसमारखाँ समझते हैं, गोया उन्हें सुरखाब के पर लगे हों।

संविधान के अनुच्छेद 351 के अनुसार 'केंद्रीय सरकार का यह कर्तव्य है कि वह हिन्दी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे ताकि वह भारत की सामाजिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके।' पर ईमानदारी से स्वतंत्रता के बाद केंद्रीय सरकारों ने कितनी कोशिशें की है? कितने लोग संसद में अपनी बात हिन्दी में कहते हैं?
WD|



और भी पढ़ें :