सपनों से बनते हैं सपने

पुस्तक समीक्षा

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वर्तमान में कविता दिल्ली, पटना और भोपाल में लिखी जा रही है। आलोचक उसे सराह भी रहे हैं। वह पुरस्कृत भी हो रही है। कविता और आलोचना एक-दूसरे का हाथ थामे दिल्ली, पटना और भोपाल में संभव हो रही है। हालाँकि कविताएँ दुमका, आरा, हजारीबाग, दरभंगा, इलाहाबाद, जबलपुर, हैदराबाद, जयपुर, लुधियाना आदि आदि जगहों पर भी लिखी जा रही हैं। असंभव से होते जा रहे इस समय में इन तमाम छोटी जगहों पर बड़ी कविताएँ लिखी जा रही हैं।

शंभु बादल सरीखे हिंदी में कई कवि हैं जो अपने समय और समाज से बेखबर होकर कविता नहीं लिख रहे हैं। अपने समय और समाज में सशक्त उपस्थिति की है उनकी कविता और इसलिए यह बगैर आलोचक और पुरस्कारों के भी अपने पाठक खोज ही लेती है। हाल ही में शंभु बादल का तीसरा संग्रह 'सपनों से बनते हैं सपने' प्रकाशित हुआ है।

शंभु बादल की कविता में अपने समय और समाज की गहरी पहचान नजर आती है इसलिए इन कविताओं की स्थानिकता इनकी सीमा नहीं बल्कि ताकत बन जाती है। शंभु बादल की कविताओं में वर्तमान परिदृश्य की उपस्थिति हमें आश्वस्त करती है कि दिल्ली, पटना और भोपाल में नहीं होते हुए भी कवि वहाँ के यथार्थ से अनभिज्ञ नहीं है। 'दोस्त !/तुम लिखते हो कविता/लिखते हो उपन्यास/लिखते हो नाटक- कहानी/लेख आलोचना सब/सच -सच ?'

उनका यह स्वर बताता है कि वह सच की चादर में लिपटा यह झूठ पहचानते हैं। वह कविता का स्याह और सफेद भी समझते हैं और उन्हें यह भी मालूम है कि कविता क्या कर सकती है, इसलिए जब वह पूछते हैं- 'झूठ सच का मेल/ किस चादर से ढँकते हो!/इनके बीच के अपशब्द कब फूटेंगे?/टकराव कब चमकेगा?' तो वह कविता को लेकर एक बेहद जरूरी सवाल उठते हैं।

यह सवाल तब और जरूरी हो जाता है जब सच्ची कविता के लिए बहुत कम जगह रख छोड़ी जाए। ऐसे में कविता के प्रति सच्ची उम्मीद बहुत जरूरी हो जाती है। शंभु बादल की कविता कविता के प्रति यह सच्ची उम्मीद और पुख्ता करती है। 'कवि की सघन आवाज की/उफनती परतें उठा कर देखो/तुम्हें बहुत कुछ मिलेंगे।' इसे महज छद्म आशावाद कहकर नकारा नहीं जा सकता क्योंकि यह आवाज संघर्ष की जमीन से फूटती अंखुआती आवाज है।

महानगरीय जीवनबोध के चश्मे से देखने पर संभव है कि ये कविताएँ सरलीकृत लगें और संघर्ष की बात न करने वाली कविताएँ रुचिकर और जटिल लगें। विश्व-राजनीति में आए परिवर्तन को अपने समय और समाज से जोड़कर देखने कि प्रवृत्ति शंभु बादल की इन कविताओं को खास अर्थ में प्रासंगिक बना देती है।

लेकिन शंभु बादल की कविताओं में इन सपनों को देखने वाली आँखों की चमक और तपिश बनी रहती है। मनुष्य की मुक्ति का स्वप्न शाश्वत होते हुए भी गतिशील है। यह स्वप्न ही दरअसल उसकी मनुष्यता बचाता है। ऐसे क्रूर और आततायी समय में हरीश के बहाने कवि उसी मनुष्यता को बचाने का स्वप्न देख रहा है जो अगर बची रही तो दुनिया बची रहेगी। सच कहें तो हमारी जिंदगी से बहुत लंबी होती है सपनों की जिंदगी।

पुस्तक : सपनों से बनते हैं सपने
कवि : शंभु बादल
प्रकाशक : वाणी

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