गुरुदत्‍त : जन्‍मदिवस पर विशेष

ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्‍या है

किसी गहरे कवित्‍व और रचनात्‍मकता के बीज बहुत बचपन से ही उनके भीतर मौजूद थे। बत्‍ती गुल होने पर बालक गुरुदत्‍त दीये की टिमटिमाती लौ के सामने अपनी उँगलियों से दीवार पर तरह-तरह की आकृतियाँ बनाता। उन दिनों यह दोनों छोटे भाइयों आत्‍माराम और देवीदास और इकलौती छोटी बहन ललिता के लिए सबसे मजेदार खेल हुआ करता था।



और भी पढ़ें :