आयशा केस : हमने जफ़ा न सीखी.. उनको वफा न आई


8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की तैयारियां जोरों पर हैं। मेरी ओर से भी जगत की सारी महिलाओं को शक्ति प्रणाम। उस दिन जगह-जगह महिला शक्तियों के जसगान गाए जाएंगे। इतिहास से अब तक के उनके सारे योगदान याद किए जाएंगे। उनकी प्रतिभाओं को सम्मानित किया जाएगा और सारे अखबार, न्यूज चैनल कुछ नया पेश करने की होड़ में दौड़ते नजर आएंगे। कार्यस्थलों पर महिलाओं के लिए आयोजन किए जाएंगे। मन गद्-गद् हो जाएगा महिलाओं के लिए इतना सम्मान देखकर।
हर महिला को कंधे से कंधा मिलाने नहीं, बल्कि पुरुषों से आगे हो जाने का श्रेय गौरवान्वित करेगा। प्रगतिशील महिलाएं, उच्चवर्गीय, आर्थिक रूप से स्वतंत्र, कला, लेखन के कार्यों में व्यस्त महिलाओं को तो उन दिनों फुरसत भी नहीं रहेगी कि सांस भी ले लें। क्यूंकि उन्होंने अपने आपको मजबूत बनाया है, अपना मुकाम अपने दम पर और अपनी काबिलियत से हासिल किया है, अत: वो ये सब डिजर्व करती हैं। उन्होंने हालातों से हार नहीं मानी। लड़ी हैं वो, खुद को स्थापित करने के लिए, खुद के सीमित दायरों से बाहर आई हैं, समाज के बनाए पंगु नियमों को उन्होंने तोड़ा है।
पर! पर! इतने सशक्तीकरण​ के बाद भी... आयशा(ओं) को मरने से क्यों नहीं​ रोका जा सक रहा? आज भी आयशा(एं) ऐसे कदम क्यूं उठाने पर मजबूर हैं? वो क्यों कहती नजर आ रही हैं कि पता नहीं कहां कमी रह गई? क्या उन्हें मजबूत बनाने में कोई कमी रखी जा रही है? शिक्षा के जरिए उन्हें आत्मनिर्भर और सशक्त बनाने में झिझक हो रही है? उन्हें शिक्षित होने और उसके लाभों के बारे में नहीं बताया जा रहा? धर्म और ईश्वर का सहारा लेकर स्वर्ग और जन्नत के सपने दिखाए जा रहे हैं?
लड़की होने के नाम पर शुरू से ही कमजोर और दबा हुआ बना देना? भावनात्मक रूप से उन्हें सिखाया जाना कि एक पुरुष ही तुम्हारा पालनहार है? उसे साथी की परिभाषा नहीं समझाया जाना? पुरुष से अलग भी तुम एक व्यक्तित्व हो, ये कब सिखाया जाएगा? लड़कियों के लिए ऊंची हंसी, ऊंची आवाज, गलत को गलत कहना आज भी प्रतिबंधित है। उनके कपड़ों की आड़ लेकर बलात्कारों को अंजाम देना आखिर कब तक जारी रहेगा? कमजोर बनाने का प्रशिक्षण केंद्र कहां है? सोच? या वे खुद? या घर? या तथाकथित सभ्य समाज?
आयशा(ओं) को समझाया जाए कि प्रेम जरूरी है, पर उनके जीवन से ज्यादा जरूरी नहीं। प्रेम समझने के लिए आरिफ़(ओं) का संवेदनशील होना भी उतना ही आवश्यक है, जितना तुम्हारा? समझ न आए तो रास्ते अलग करने हैं, प्यारी नदियों को जरिया नहीं बनाना है। बात करके भी रास्ते न निकलें तो अदालत से न्याय मांगने में हर्ज नहीं। आप लड़ने नहीं आई हो ये सच है, हवा में बहना चाहती हो ये भी सच है, पर! जान देकर? ये सच नहीं।
आपके माता-पिता आपको इस दुनिया में लाए हैं। उनकी जिम्मेदारी भी आपकी ही है। उनसे कैसा बैर? अपने मां-बाप से ये कहकर लड़ें कि शादी को अंतिम जिम्मेदारी समझकर मुक्ति पाना बंद होना चाहिए। सजी-संवरी प्लास्टिक की गुड़िया-सी बस किसी शोकेसनुमा घर की शोभा बढ़ाने का काम बंद होना चाहिए। उन्हें अपनी मर्जी से जीने और निर्णय लेने के अधिकार हैं। उत्पादन की मशीन समझना बंद किया जाना चाहिए।

तुम्हारे मरने से आरिफ़(ओं) के मन में कोई प्रेम का अंकुर नहीं फूटेगा बल्कि उन्हें बहुत-थोड़े दिन की प्रताड़ना के बाद एक और आयशा परोस दी जाएगी या वे खुद ढूंढ लेंगे। तुम्हारा प्रेम किसी नदी में पड़ा सड़ चुका होगा। ऐसे लोग किसी को भी मजबूर कर सकते हैं इस खूबसूरत दुनिया से जाने के लिए। और हंसेंगे भी तुम्हारी मूर्खताओं और अपनी विजय पर। किसी भी आरिफ़ के लिए चरित्रहनन का आरोप सबसे बड़ा और सरल उपाय है आयशा(ओं) को उसकी नज़रों में गिराने के लिए। वो अपने आप से घबराकर घृणा करने लगे और इस दुनिया को अलविदा कह दें। बस रास्ता साफ।
21वीं सदी में ऐसे मां-बाप भी हैं, जो बेटियों को उसी नरक में मरने की सलाह और मुंहमांगा पैसा देकर चुप रहना सिखाते हैं, साथ ही अपनी खोखली इज्जत बचाते रहते हैं। वो किस मानसिक प्रताड़ना से गुजर रही हैं, उन्हें इस बात का अंदाज होता भी होगा तो भी अपने संघर्षों की दास्तान सुना-सुनाकर वहीं पड़े रहने को मजबूर करते हैं। संभालिए, वरना सुधार संभव नहीं। पीड़िता बेचारी इसी आस में रहती है कि वो कभी तो सुधर ही जाएगा। कभी तो पिघल ही जाएगा। कभी तो प्रेम पहचानेगा? ये सब खुद को कमजोर बनाने और करने के हथियार हैं।
आयशा(ओं) से दरख्वास्त है, साबरमती (नदियों) को गले लगाइए, उनको अपने दुख से खारा मत कीजिए। प्रेम पाने का अधिकार सबको है, पर न मिले तो फ़ना मत हो जाइए। क्या हुआ जो, 'हमने जफ़ा न सीखी, उनको वफ़ा न आई...!'



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