अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस : प्रश्नों का दिवस

कहाँ है जवाब, कौन देगा उत्तर ?

NDND
इस सदी के आधुनिक कोने पर खड़े होकर हम आज फिर इसकी आधी आबादी के विषय में सोचने के लिए मजबूर हैं। न जाने कितने मंचों पर आयोजित होगा, परिसंवाद, गोष्ठियाँ, चिंतन और विमर्श होंगे। नारी-स्वतंत्रता जैसे शब्दों को भाषणों में इतना घीसा जाएगा कि अंतत: ब्लेकबोर्ड पर चलते-चलते खत्म हो जाने वाले चॉक की तरह वे शब्द अपना अर्थ-गौरव ही खो बैठेंगे।

किंतु नारी से जुड़ा सच इतना तीखा और मर्मांतक है कि संवेदना की कोमल त्वचा पर सूई की नोंक सा चुभता है। वैसे नारी से जुड़े प्रश्नों को उठाने की कोशिश करनी ही नहीं चाहिए, क्योंकि उससे संबंधित प्रश्न तो ऐसे हैं जो स्वत: ही सतह पर आ जाते हैं, लेकिन हमारी मानसिक सुन्नता और वैचारिक सुप्तता इस हद तक बढ़ चुकी है कि बलात्कार जैसी भयावक घटना भी हम उससे नहीं बल्कि धर्म से जोड़कर देखते हैं।

बलात्कार एक हृदय विदारक मुद्‍दा है, जिसे लेकर चिंतित सभी हैं - सरकार, समाज, संस्थाएँ और संगठन, लेकिन परिणाम, स्थिति और वास्तविकता आज भी वही‍ है, जैसे पहले थे बल्कि पहले से और बढ़े हैं और ज्यादा विकृत हुए हैं।

जहाँ एक ओर ग्रामीण क्षेत्रों में पीड़ित महिलाएँ कुएँ में छलाँग लगा देती हैं, वहीं शहरी क्षेत्रों में घुट-घुटकर जीने को विवश कर दी जाती हैं। यदि ग्रामीण क्षेत्र में पीड़िता मुँह खोलती है तो डायन करार देकर पत्थरों से पीट-पीटकर मार डाली जाती है और शहरी क्षेत्रों में मुँह खोलती है तो तंदूर, मगरमच्छ, आग, पानी, तेजाब जैसे अनेक उपाय हैं उसका मुँह बंद करने के लिए।

बलात्कार ऐसी वीभत्स घटना है जिसमें पीड़ित महिला की मानसिक, हार्दिक, आत्मिक और शारीरिक क्षति का अनुमान लगाना भी दुष्कर है, लेकिन इस घृणित कृत्य के अतिरिक्त भी प्रतिदिन महिला अनेक घिनौने अनुभवों से गुजरती है। कभी बस में उसे घूरते, उस पर झुकते, उसके मुँह पर सिगरेट फूँकते बेशर्म आदमी मिलते हैं, जो पलटकर टोकने पर उसी की पीठ पर जलती सिगरेट चिपकाकर चलती बस से कूद जाते हैं तो कभी गंतव्य पर जाकर लड़की को पता चलता है कि विरोध का जवाब उसके कपड़ों पर छेदकर दिया गया है। कभी दुपहिया पर सवार लड़की के बाजू से मोटरसाइकिल पर सवार लड़के निकलते हैं और 'साइड' देने के बहाने उस पर हाथ फेरते हुए आगे बढ़ जाते हैं।

पिछले दिनों एक विकृत घटना की मैं प्रत्यक्षदर्शी रही, जिसे देखकर मेरा मानस काफी देर तक उद्वेलित-उत्तेजित रहा लेकिन मैं बस लज्जा से सिर झुकाकर रह गई। राजधानी के व्यस्ततम चौराहे पर एक वि‍क्षिप्त महिला कुछ पुरुषों के घेरे में खड़ी होकर अपने शरीर से कपड़े उतार रही थी। चारों ओर एक घिनौना और शर्मनाक अट्‍टाहस गूँज रहा था। बुद्धिजीवी बेबस थे और पुलिस आनंद (?) में निमग्न थी। पास से गुजरती लड़कियाँ-महिलाएँ शर्म से दोहरी हो रही थीं। सरे बाजार स्त्रीत्व अपमानित हो रहा था और तमाम औरतें मानसिक रूप से बलत्कृत हो रही थीं लेकिन उन (ना)मर्दों की कुत्सित और निकृष्टतम मानसिकता 'असीम संतोष' को अनुभूत कर रही थी।

स्मृति आदित्य|
बहुत देर तक सुन्नावस्था में रही मैं। कुछ सोच-समझ नहीं सकी। विक्षिप्त कौन था? उस औरत के लिए तो समझ के सारे दरवाजे बंद थे। विक्षिप्त तो उन बेशर्म पुरुषों का घेरा था, जो संवेदनाओं को मुँह में चबाकर पान के पीक की तरह चौराहे पर थूक देते हैं। विक्षिप्त, वहाँ मौजूद पुलिस के वे जवान थे, जिन्होंने अपनी ही वर्दी की लाज नहीं रखी थी।



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