पीला रंग महक रहा है
एक मासूम प्रेम कहानी
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रोज के इतने काम थे कि वह इस झीनेपन में ठीक से देख नहीं पाई। फिर इस झीनेपन पर कुछ रंग आने लगे। फिर खुशबू। उसे लगा इस रंगो-बू को समझने की कोशिश करे। वह समझती इसके पहले ही यह झीनापन एक तितली में बदल गया।
पहले एक तितली।
फिर दूसरी।
फिर तीसरी।
फिर तीसवीं।
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वह इतनी खुश थी कि वह हमेशा अपनी आँखें बंद रखती। उसे लगता उसके चेहरे पर भी तितलियाँ उतर रही हैं। वह अपने चेहरे पर धीरे से हाथ फेरती। उसे लगता उसके हाथों में कुछ धड़क रहा है। वह धीरे-धीरे अपनी ही धड़कनों को सुनते हुए हाथ खोलती और पाती कि उसके दोनों हथेलियाँ एक बड़े फूल की पीली पँखुरियों में बदल गए हैं। उसके हाथों में पीला रंग महक रहा है, जैसे किसी ने बड़े प्यार से गीत गाते हुए हल्दी लगाई हो। उसे लगा यह कोई जादू है। उसे जादू में यकीन था।
उसने पीला रंग देखा। वह खुश रंग था। लेकिन उसने सोचा उसके हाथ पीले देखकर लोग सवाल करेंगे। उसने सोचा पानी से हाथ धो ले तो यह रंग छूट जाएगा। लेकिन उसने देखा पानी में रगड़-रगड़कर हाथ धोने के बाद भी पीला रंग छूट नहीं रहा। फिर उसने साबुन लगाकर हाथ धोए। वहाँ अब भी पीला चमक रहा था। उसने कपड़े के साबुन से हाथ धोए। वहाँ पीला रंग ही दमक रहा था। उसने सोचा कैरोसिन ट्राई किया जाए। फिर सोचा मिट्टी। लेकिन उसके हाथ हमेशा के लिए पीले हो चुके थे।
तब से वह अपने पीले हाथों को सबसे छिपाए फिरती है।
