कृष्ण भी बने थे संत वेलेंटाइन!

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आज से कई सालों पहले उस पश्विमी संत ने भी यही कहा था कि आखिर पर पहरा कैसा? प्यार तो दो आत्माओं का मिलन है आप उस पर जितने पहरे लगाओगे वह उतना ही उभर के बाहर आएगा। लेकिन अफसोस उस समय किसी ने भी उसकी बात नहीं मानी और उसको सूली पर चढ़ा दिया गया।

देर-सवेर लोगों ने प्यार के मायने जाने और उस पश्विमी की सच्चे की आत्म आहूति को चिरस्मृति में बनाए रखने के लिए एक पर्व को सार्वजनिक तौर पर मान्यता दी, जिसे हम आज वेलेंटाइन-डे के नाम से जानते हैं। इस दिन दो प्रेमी एक दूसरे के सामने प्यार का इजहार करते है। एक-दूसरे को रंगबिरंगी फुल, कार्ड, चॉकलेट और अन्य कई सारी गिफ्ट देते हैं।

भारत में होली, भगोरिया, वसंतोत्सव बहुत उत्साह से मनाया जाता है और पश्विमी संस्कृति से आए हुए इस पर्व को पाश्चात्य सभ्यता की देन कहकर उसे मनाए जाने पर आपत्ति दर्ज की जाती है।

एक प्रकार से देखा जाए तो वेलेंटाइन वसंतोत्सव का ही एक आधुनिक नाम है क्योंकि यह दिन वसंत के मौसम में ही आता है। यह पर्व सिर्फ दो प्रेमियों तक सीमित नहीं रहता बल्कि पशु-पक्षी भी वेलेंटाइन-डे मनाते हैं। वसंत के मौसम ही पशु-पक्षियों का मिलन होता है। इस मौसम में दुनिया भर से कई सारे पक्षी भारत की भूमि पर आते हैं और यहाँ पर आकर अपना जोड़ा बनाते हैं।

  जब सृष्टि के पालनहार ने भी इस प्रेम के पर्व को खुले मन से स्वीकार किया तो हम कौन होते हैं इसका विरोध करने वाले? भारत में कुछ लोग इस त्योहार को फूहड़ता से भरा पर्व बताते हैं।      
भगवान श्रीने भी अपने समय में संत वेलेंटाइन का किरदार निभाया था। वृंदावन की कुंज गलियों में गोपीओं के साथ भगवान श्रीकृष्ण वसंत ऋतु के दौरान रासलीलाएँ करते-करते गोपियों के मन में प्रेम के बीज को रोपित करते थे। उनकी बाँसुरी से छोड़े गए मधुर आलापों को सुनकर गोपियाँ सब कुछ छोड़कर इस प्यार के जादूगर के पास आ जाती थीं।

वेलेंटाइन-डे (वसंत) के दौरान ही माँ उमा (पार्वती) ने भगवान श्री शंकर के प्यार को जीतने में सफलता प्राप्त की थी। इस ऋतु में ही कामदेव और रति ने संत वेलेंटाइन की भूमिका का किरदार निभाया था और अपने मोहक नृत्य से भगवान श्री शंकर के मन में देवी पार्वती के प्रति प्यार का रस जगाया था। श्रीकृष्ण ने अपनी बहन सुभ्रद्रा और अर्जुन को मिलवाने के लिए भी संत वेलेंटाइन की भूमिका निभाई थी।

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जनकसिंह झाला
जब सृष्टि के पालनहार ने भी इस प्रेम के पर्व को खुले मन से स्वीकार किया तो हम कौन होते हैं इसका विरोध करने वाले? भारत में कुछ लोग इस त्योहार को फूहड़ता से भरा पर्व बताते हैंइसके पीछे उनकी मानसिक सोच जिम्मेदार है क्योंकि यह लोग इस त्योहार को पश्विम से आया कोई गंदा तोहफा मानते हैं। इन लोगो से मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूँ कि जब हम भारत में सभी त्योहार धूमधाम से मनाते है तो फिर वेलेंटाइन-डे को मनाने में बुराई क्या है?



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