बस तेरी याद ही काफी है मुझे
साबिर इंदौरी
ND
NDअब फलक पर कोई तारा भी नहीं
बस तेरी याद ही काफी है मुझे
और कुछ दिल को गवारा भी नहीं
जिसको देखूँ तो मैं देखा ही करूँ
ऐसा अब कोई नजारा भी नहीं
डूबने वाला अजब था कि मुझे
डूबते वक्त पुकारा भी नहीं
कश्ती ए इश्क वहाँ है मेरी
दूर तक कोई किनारा भी नहीं
दो घड़ी उसने मेरे पास आकर
बारे गम सर से उतारा भी नहीं
कुछ तो है बात कि उसने साबिर
आज जुल्फों को सँवारा भी नहीं।
(ये साबिर इंदौरी की उन आखिरी ग़ज़लों में से एक है, जिसे उन्होंने कहीं नहीं पढ़ा, किसी को नहीं सुनाया।)

