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Written By अनिरुद्ध जोशी

Shri Krishna 27 June Episode 56 : धृतराष्ट्र जब अक्रूरजी से मथुरा की सहायता करने से करते हैं इनकार

Shri Krishna 27 June Episode 56 : धृतराष्ट्र जब अक्रूरजी से मथुरा की सहायता करने से करते हैं इनकार - Shri Krishna on DD National Episode 56
निर्माता और निर्देशक रामानंद सागर के श्रीकृष्णा धारावाहिक के 27 जून के 56वें एपिसोड ( Shree Krishna Episode 56 ) के पिछले एपिसोड में अक्रूरजी विदुर, भीष्म से मिलकर श्रीकृष्‍ण का संदेश सुनाते हैं दोनों ही उनके प्रति अपनी श्रद्धा को प्रकट करते हैं इसके बाद अक्रूरजी माता कुंती से मिलने जाते हैं।
 
रामानंद सागर के श्री कृष्णा में जो कहानी नहीं मिलेगी वह स्पेशल पेज पर जाकर पढ़ें...वेबदुनिया श्री कृष्णा
 
 
फिर अक्रूरजी पांडवों की माता कुंती से मिलने जाते हैं। कुंती कहती हैं कि आज दुर्भाग्यवश मेरी यहां कोई नहीं सुनता। यह विधवा विवश है। मेरे बालक उनकी आंखों में खटकने लगे हैं। दुर्योधन ने तो एक बार मेरे भीम को विष देकर मार ही दिया था लेकिन वह बच गया। बस विदुर भैया ही है जो मेरी सहायता करते हैं। मथुरा मैं तो मेरी चिंता करने वाला कोई नहीं है। तब अक्रूरजी कहते हैं ऐसा नहीं है कृष्ण आपकी चिंता करते हैं। माता कुंती कहती हैं कृष्ण? वसुदेवजी का पुत्र कृष्‍ण? अक्रूरजी कहते हैं हां। फिर माता कुंती कहती हैं कि मैं उनकी बातें तो सुनती रहती हूं। सुना है कि वे कोई अलौकिक शक्ति वाला बालक है। अक्रूरजी कहते हैं अलौकिक शक्ति वाला बालक नहीं वे तो स्वयं सर्वशक्तिमान भगवान हैं। फिर अक्रूरजी उन्हें अपनी यमुना वाली घटना का अनुभव बताते हैं। फिर अक्रूरजी श्रीकृष्‍ण का संदेश सुनाते हैं। माता कुंती यह सुनकर प्रसन्न हो जाती है।
 
बाद में अक्रूरजी महाराज धृतराष्ट्र से मिलते हैं। धृतराष्ट्र कहते हैं कि हमारा फर्ज है कि हम आपकी सहायता करें लेकिन हमारा राज्य भी संकट में हैं क्योंकि राजकुमार छोटे हैं और अंधा राजा समझकर हमारे शत्रु भी हम पर आक्रमण करने की इच्छ लिए बैठे हैं। हम पर भी किसी भी समय आक्रमण हो सकता है इसलिए हम आपकी सहायता नहीं कर सकते हैं। हां हम भगवान से प्रार्थना अवश्य करेंगे कि वे महाराज उग्रसेन की सहायता अवश्य करें। अक्रूरजी कहते हैं कि आपकी इस सद्भावना के लिए धन्यवाद। क्योंकि जब भगवान ही उनकी सहायता करेंगे तो फिर उन्हें किसी दूसरे की सहायता की आवश्यकता ही कहां होगी।
 
महाराज जाने से पहले मैं आपको वो संदेश सुनाता चाहता हूं जो श्रीकृष्ण ने मुझे दिया है। धृतराष्ट्र कहते हैं मेरे अहोभाग्य। तब अक्रूरजी श्रीकृष्‍ण का संदेश सुनाते हैं श्रीकृष्‍ण कहते हैं कि हे कुरुनंदन आप अपने स्वजनों के प्रति समानता का व्यवहार कीजिये और अपनी प्रजा का पालन करें। इसी में आपका कल्याण है महाराज। लेकिन धृतराष्ट्र जाते जाते अक्रूरजी से कहते हैं कि जो कुछ हो रहा है उन्हीं कि इच्‍छा से हो रहा है तो फिर वे मनुष्य पर दोष क्यों लगाते हैं? अक्रूरजी श्रीकृष्ण का संदेश सुनाकर चले जाते हैं। 
 
अक्रूरजी आकर श्रीकृष्ण को सभी तरह के समाचार सुनाते हैं। श्रीकृष्‍ण कहते हैं देखिये अक्रूरजी मनुष्‍य का अहंकार कितना प्रबल होता है कि यदि स्वयं भगवान भी उसे उपदेश दें तो उस पर कोई असर नहीं होता है। फिर श्रीकृष्‍ण विदुर और कुंती के बारे में जानते हैं। अक्रूरजी कहते हैं विदुर तो आपके परम भक्त हैं। वे आपसे मिलने के लिए बड़े उतावले हैं। श्रीकृष्‍ण कहते हैं हम उनसे भी अधिक उतावले हैं अक्रूरजी अपने धर्मराज के दर्शन के लिए। अक्रूरजी चौंक कर पूछते हैं धर्मराज? कृष्ण कहते हैं हां वे धर्मराज के ही अवतार हैं। जिन्हें महर्षि मांडव के श्राप के कारण इस धरती पर मनुष्य योनी धारण करना पड़ी है। फिर श्रीकृष्‍ण महर्षि मांडव ऋषि की कथा सुनाते हैं और बताते हैं कि किस तरह श्राप लगा। जय श्रीकृष्ण। 
 
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