Shri Krishna 3 June Episode 32 : देवकी ने मजबूर हो बताया कृष्ण मेरा पुत्र और उधर जब नंद को पता चला सत्य

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अनिरुद्ध जोशी|
निर्माता और निर्देशक के श्रीकृष्णा धारावाहिक के 3 जून के 32वें एपिसोड ( Shree Krishna Episode 32 ) में पिछले एपिसोड में बताया गया था कि अक्रूरजी को इस बात के लिए मनाता है कि तुम किसी भी तरह से को मथुरा में ले आओ ताकि मैं उसे बालक का वध कर सकूं लेकिन अक्रूरजी इसके लिए मना कर देते हैं। वे कहते हैं कि यदि वह बालक नंद का है तो भी मैं उस निर्दोष की हत्या का पक्ष नहीं ले सकता और यदि वह सच में ही वसुदेव की आठवीं संतान है तो उनकी आठवीं संतान की रक्षा करना मेरा धर्म है क्योंकि कुमार वसुदेव मेरे स्वामी हैं। ऐसा कहकर अक्रूरजी वहां से चले जाते हैं।
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फिर कंस अपने सभी दरबारियों से चर्चा करता है। कंस चाणूर की ओर देखता है तो चाणूर कहता है ये बहुत बुरा हुआ। इस चाल के असफल होने का अब ये अर्थ होगा कि हमारे शत्रु को हमारे न्यौते का अर्थ समझ में आ जाएगा और अब वह हमारे इस जाल में नहीं फंसेगा।

यह सुनकर एक दरबारी गोकुल पर आक्रमण करके नरसंहार की बात करता है लेकिन चाणूर उसकी बात को काटकर कहता है इससे जनविद्रोह हो जाएगा। मेरे विचार में अभी एक चाल और है। कंस कहता है वो क्या? तब चाणूर कहता है कि मछली जाल में नहीं फंसे तो उसे जबरदस्ती जाल में डालने के कई तरीके हैं। फिर कंस पूछता है कौन से? यह सुनकर चाणूर कहता है आइये मेरे साथ महाराज। मैं बताता हूं।
चाणूर कंस को कारागार में ले जाता है। कंस वहां पहुंचकर देवकी से कहता है कि मैं तुमसे एक प्रश्न पूछने आया हूं और यदि तुमने झूठ बोला तो आज तुम दोनों के प्राण नहीं बचेंगे। मैंने पहले भी एक बार वसुदेव से यही प्रश्न पूछा था जिसके उत्तर में इन्होंने केवल मौन धारण कर लिया था। परंतु आज न झूठ से काम चलेगा और न मौन से। यदि सही उत्तर दिया तो कारागार से मुक्त कर दूंगा। फिर कंस वसुदेवजी से पूछता है क्या यह कृष्ण नाम का बालक जो गोकुल में पल रहा है क्या यही देवकी की आठवीं संतान है?
यह सुनकर वसुदेव कहते हैं कि देवकी की आठ संतानें तो हुई नहीं क्योंकि एक बार देवकी का गर्भपात हो गया था। यह सुनकर कंस फिर देवकी से पूछता है, देवकी तुम्हारा क्या उत्तर है? देवकी कहती है जो इन्होंने कहा वही सत्य है। यह सुनकर कंस कहता है कि शब्दों के हेरफेर से झूठ सत्य में नहीं बदल जाता। तुम दोनों ही झूठ बोल रहे हो। शायद तुम जानते नहीं कि मुझे सत्य का पता चल चुका है। नारद ने स्वयं मुझे बताया कि कृष्ण तुम्हारा ही पुत्र है और अब तुम बताओ कि क्या यह सत्य है?
तब वसुदेवजी कहते हैं कि यदि देवर्षि नारदजी की बातों पर आपको पूर्ण विश्वास है तो देवकी के हां या ना कहने से क्या अंतर पड़ता है। यह सुनकर कंस कहता है कि अंतर पड़ता है क्योंकि यदि तुम यह स्वीकार करते हो कि कृष्‍ण तुम्हारा ही पुत्र है तो तुम वचनबद्ध हो। तुम स्वयं ही उसे यहां बुलाकर मेरे हाथों समर्पित कर दो। आकाशवाणी के समय दिया हुआ वचन याद करो। सत्यवादी वसुदेव तुझ झूठे हो। तुमने मेरे साथ छल किया है। तुम घोर अपराधी हो। मैं तुमसे अंतिम बार पूछता हूं कि सत्य क्या है।
देवकी और वसुदेव दोनों मौन रह जाते हैं तब कंस चाणूर और प्रहरी को बुलाकर कहता है कि वसुदेव को कारागार के अंधे कुवे में डाल दिया जाए और मेरे 10 गिनने तक यदि देवकी कृष्ण को बुलाकर मेरे हवाले करना स्वीकार न करें तो वसुदेव को जहरिले सांपों से भरे उस कुवे में गिरा दिया जाए। यह सुनकर देवकी घबरा जाती है।

वसुदेवजी को घसिटकर ले जाया जाता है तब देवकी रोने लगती है और कहती है इनके प्राण मत लोग मेरे ले लो। कंस बार-बार पूछता है तुम स्वीकार करती हो कि कृष्ण तुम्हारा ही पुत्र है? देवकी हर बार नहीं बोलती है तब कंस कहता है तो ठीक है ऐसा कहकर कंस चाणूर को आवाज लगाता है यह देखकर देवकी डर जाती है और कहती है...हां, हां। हां मैं स्वीकार करती हूं। मैं सच स्वीकार करती हूं कृष्ण मेरा ही पुत्र है भैया। यह सुनकर कंस प्रसन्न हो जाता है।

उधर वसुदेव को कुवे में लटका दिया जाता है तब कंस देवकी का हाथ पकड़कर लाता है। देवकी कुवे में झांकती है तो उसे कई सांप दिखाई देते हैं। देवकी कहती है भैया अब तो दया करो। अब तो मैंने स्वीकार कर लिया है कि कृष्ण मेरा ही पुत्र है। यही तो तुम चाहते थे। अब तो तुम इन्हें छोड़ दो। यह सुनकर कंस कहता है नहीं इतने से काम नहीं चलेगा। अपने वचन के अनुसार अपने पुत्र को बुलाकर मेरे हवाले कर दो। नहीं तो तुम्हारा पति जिंदा नहीं रहेगा। आज ही अक्रूरजी से कहो कि वह उस कृष्‍ण को किसी भी बहाने से बुलाकर मथुरा ले आए या अपने पति की बली दे दो।
देवकी कहती है को? कंस कहता है हां अक्रूर को क्योंकि अक्रूर के कहने से ही वह आ सकता है। अक्रूर गोकुल जाकर उससे मिलता-जुलता रहता है। अब तुम निर्णय कर लो कि तुम्हें पति चाहिये या पुत्र। आखिकार देवकी मान जाती है।

फिर देवकी से कारागार में अक्रूरजी मिलते और देवकी उन्हें कृष्‍ण को मथुरा लाने का कहती हैं। अक्रूरजी कहते हैं आप ये क्या कह रही हैं आप अपने ही पुत्र को उसके हवाले करना चाहती हैं जो उसकी हत्या करना चाहता है। यह सुनकर देवकी कहती हैं मैं जानती हूं। तब अक्रूरजी कहते हैं फिर भी आप मुझको कृष्ण को मथुरा लाने का कह रही हैं। फिर अक्रूरजी रोते हुए मैं कृष्ण से क्या कहूंगा। यह कि आपकी माता ने आपकी हत्या करवाने के लिए मथुरा बुलाया है? यह सुनकर देवकी कहती हैं कि इतना कुछ कहने की आपको आवश्यकता नहीं है। बस इतना ही कहना की उसकी मां की आज्ञा है कि वह आपके साथ मथुरा आ जाए।
तब अक्रूरजी कहते हैं कि यदि उसने पूछा, क्यों? और यदि उसने आने से इनकार किया तब? यह सुनकर देवकी कहती हैं कि यदि वह मेरा पुत्र है तो न क्यूं पूछेगा और न इनकार करेगा। बस मां की आज्ञा का पालन करेगा।

अक्रूरजी कई प्रकार से देवकी को समझाते हैं और कहते हैं कि हमें उसे बचाना है क्योंकि जनता उसे तारणहार और भगवान मानती है। यह सुनकर देवकी कहती हैं अक्रूरजी कृष्ण यदि भगवान है तो हमें उसके लिए डरने की कोई आवश्यकता नहीं। वह अपनी सुरक्षा स्वयं कर सकता है और यदि वह सिर्फ मानव है, केवल मेरा पुत्र है तो एक पतिव्रता के धर्म को मानते हुए मुझे अपने पति को ही चुनना होगा। मेरी आज्ञा अटल है उसका पालन किया जाए।
अक्रूरजी वहां से चले जाते हैं और वह सभी यादवों सरदारों को यह बात बताते हैं और कहते हैं कि अब हमें अपने राजकुमार के प्राण बचाने हैं। वे फिर बलराम, रोहिणी और कृष्ण को बचाने की योजना बनाते हैं। वे बताते हैं कि एक आत्मघाती दल रोहिणी और की सुरक्षा करेगा। दूसरा दल रास्ते में कृष्ण की सुरक्षा करेगा और तीसरा दल यमुना के दूसरे किनारे मेरे संकेत का इंतजार करेगा। अक्रूरजी और भी कई तरह की योजना बताते हैं। फिर अक्रूरजी अपनी योजना के तहत अपने गुप्तचरों और सैनिकों को लेकर गोकुल में पहुंच जाते हैं।

उधर, बलराम और श्रीकृष्‍ण के साथ भोजन के लिए बैठे नंदबाबा कहते हैं कि सुना है कि मथुरा में बहुत बड़ा उत्सव होने वाला है। यह सुनकर कृष्‍ण कहते हैं आपको किसने कहा? तब नंदबाबा कहते हैं कलवा ने जो रोज मथुरा सब्जी बेचने जाता है। कहते हैं कि महाराज ने आज्ञा दी है कि मथुरा नगरी को दुल्हन की तरह सजा दिया जाए। तब बलराम कहते हैं परंतु अचानक यह उत्सव कैसे बाबा? तब नंदबाबा कहते हैं कि सुना है कोई यज्ञ करवाया जा रहा है।
तभी एक सेवक आकर कहता है कि द्वार पर अक्रूरजी पधारे हैं। नंद कहते हैं अच्छा ठहर जाओ। अब हम भोजन उन्हीं के साथ करेंगे। रोहिणी कहती हैं यूं अकस्मात अक्रूरजी कैसे आ गए? यह सुनकर श्रीकृष्ण मुस्कुरा देते हैं। फिर अक्रूरजी को नंदबाबा अंदर ले आते हैं।
श्रीकृष्ण और बलराम खड़े होकर उनका अभिवादन करते हैं। अक्रूरजी पहले बलराम और फिर श्रीकृष्ण को गले लगा लेते हैं।

फिर सभी साथ मिलकर भोजन करते हैं। तब रोहिणी पूछती है कि अक्रूरजी नंदरायजी कह रहे थे कि महाराज कंस कोई यज्ञ करने जा रहे हैं? यह सुनकर अक्रूरजी थोड़ा संकोचकर कहते हैं कि हां। तब रोहिणी कहती हैं कि कंस और यज्ञ। इन दोनों बातों में मेल नहीं बैठता अक्रूरजी। फिर अक्रूरजी शिव के धनुष के बारे में बताकर धनुषयज्ञ करने की बात बताते हैं और कहते हैं कि देश के कोने-कोने से वीर योद्धाओं को बुलाकर सम्मानित किया जाएगा।

यह सुनकर श्रीकृष्ण कहते हैं कि फिर तो बड़ी धूम होगी राजधानी में? यह सुनकर अक्रूरजी श्रीकृष्ण को देखने लगते हैं। फिर आगे श्रीकृष्ण कहते हैं दाऊ भैया फिर हमें भी चलना चाहिए। दाऊ भैया कहते हैं अवश्य चलना चाहिए। यह सुनकर अक्रूरजी दोनों को आश्चर्य से देखने लगते हैं। फिर कृष्ण कहते हैं बाबा हम सब उत्सव में चलेंगे। यह सुनकर यशोदा मैया कहती हैं मैं तुम्हें किसी उत्सव में नहीं जाने दूंगी।
तुम्हारा वहां क्या काम। यह सुनकर श्रीकृष्ण कहते हैं कि वहां बड़े-बड़े वीर आएंगे उनके करतब देखेंगे तो बड़ा आनंद आएगा।

यह सुनकर यशोदा मैया कहती हैं तुम कौनसे बड़े वीर हो जो तुम्हें आनंद आएगा। वहां सब योद्धा लोग हाथों में अस्त्र लिए मदिरा में मस्त बाजार में घुमते रहेंगे और कौन जाने कब आपस में ही लड़ पड़े। इसलिए मैं तुम्हें नहीं जाने दूंगी। यह कहकर यशोदा मैया उठकर चली जाती हैं।
तब श्रीकृष्ण कहते हैं कि लो मैया ने तो सब बंटाढार कर दिया। बाबा अब आप ही मनाओ ना मैया को। यह सुनकर नंदबाबा कहते हैं कि भई तुम जानो और तुम्हारी मैया। मुझे इस झगड़े में मत डालो। क्यों अक्रूरजी? अक्रूरजी सकपका कर कहते हैं, हां बिल्कुल ठीक कहा आपने।

यह सुनकर श्रीकृष्‍ण अक्रूरजी से कहते हैं, काका आप भी इन्हीं लोगों के साथ हैं? यह सुनकर अक्रूरजी कहते हैं कि भई मैं क्या कर सकता हूं। यह सुनकर नंद बाबा कहते हैं कि अब कोई कुछ नहीं कर सकता। यह सुनकर श्रीकृष्ण रहस्यमी मुस्कान छेड़ देते हैं।
बाद में नंद बाबा अकेले में अक्रूरजी से पूछते हैं कि इस तरह अकस्मात आने का कुछ तो कारण होगा? तब अक्रूरजी कहते हैं कि नंदरायजी मैं एक न्यौता लेकर आया हूं। नंद बाबा पूछते हैं न्यौता किसका? तब अक्रूरजी कहते हैं महाराज कंस का। यह सुनकर नंदरायजी शंका से घिर जाते हैं और कहते हैं महाराज कंस का? किसके लिए?

यह सुनकर अक्रूरजी कहते हैं कृष्ण के लिए। तब नंदरायजी चौंक जाते हैं। फिर अक्रूरजी कहते हैं कि महाराज कंस ने कृष्ण को मथुरा बुलाया है। तब नंदबाबा कहते हैं कि महाराज को कृष्ण से मथुरा में क्या काम है? तब अक्रूरजी कहते हैं कि मथुरा के उत्सव में सारे वीर अपनी-अपनी वीरता का प्रदर्शन करेंगे। महाराज कंस चाहते हैं कि कृष्ण भी उस अवसर पर आए। हो सकता है कि वो उसे उसकी वीरता के लिए सम्मानित करना चाहता हो। यह सुनकर नंदाबाबा घबराकर कहते हैं कि रहने दें अक्रूरजी, उसे किसी सम्मान की आवश्‍यकता नहीं। यशोदा उसे कहीं नहीं जाने देंगी।
तब अक्रूरजी कहते हैं कि परंतु उसे जाना होगा। यह सुनकर नंदबाबा थोड़ा क्रोधित होकर कहते हैं कि मगर क्यूं? हम उसे नहीं भेजना चाहते फिर क्यूं जाना होगा? तब अक्रूरजी कहते हैं कि क्योंकि यह महाराज कंस की आज्ञा है। नंदरायजी ये राजाज्ञा है। यह सुनकर नंदरायजी कहते हैं कि और यदि हम उसे ना भेजें तो? अक्रूरजी कहते हैं तो राजाज्ञा भंग करने पर राजा के सैनिक की आ सकते हैं और मेरे विचार से राजा के सैनिक गोकुल के आसपास ही कहीं होंगे। देख रहे होंगे कि राजा की आज्ञा का पालन हो रहा है या नहीं।
यह सुनकर बैचेन हो जाते हैं और खड़े होकर कहते हैं ये कैसी आज्ञा है। ये तो अत्याचार है कि माता-पिता के पूछे बिना किसी बालक को यूं जबरदस्ती उठा लिया जाए।

तब अक्रूरजी कहते हैं कि महाराजा कंस ने यह आज्ञा कृष्ण के माता-पिता से पूछकर ही दी है। यह सुनकर अक्रूरजी चौंकते हुए पूछते हैं माता-पिता से पूछकर आज्ञा दी है? यह सुनकर अक्रूरजी हां में गर्दन हिला देते हैं। फिर नंदराजयजी कहते हैं, परंतु हमसे तो किसी ने नहीं पूछा।
तब अक्रूरजी खड़े होकर कहते हैं, नंदरायजी कोई-कोई सत्य बड़ा भयंकर और दुखदायी होता है। फिर अक्रूरजी नंदबाबा के कंधे पर हाथ ठोककर कहते हैं आप पुरुष हैं। कलेजा पत्थर का कर लीजिये और पूरी हिम्मत से इस सत्य को सुनिये। यह सुनकर नंदरायजी की अक्रूरजी को गौर से भयभीत होकर देखने लग जाते हैं।

अक्रूरजी फिर कहते हैं, इस सत्य को सुनिये कि कृष्ण आपका पुत्र नहीं है। यह सुनकर नंदबाबा जोर से चीखते हैं.. अक्रूरजी और उनका हाथ अक्रूरजी की गर्दन की ओर बढ़ जाता हैं। दूसरे कक्ष में उनकी चीख सुनकर रोहिणी और यशोदा भयभीत होकर खड़ी हो जाती है। जय श्रीकृष्ण।
रामानंद सागर के श्री कृष्णा में जो कहानी नहीं मिलेगी वह स्पेशल पेज पर जाकर पढ़ें...वेबदुनिया श्री कृष्णा




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