भारत के महान राजा संवरण और सुदास

अनिरुद्ध जोशी| Last Updated: मंगलवार, 31 दिसंबर 2019 (15:12 IST)
वेद और पुराणों में भारतीय ऋषि और राजाओं के बारे में विस्तार से मिलता है। ऐसे कई राजा है जिनको भारत के लोग बहुत कम ही जानते होंगे जबकि ये राजा उतने ही महान थे जितने की चक्रवर्ती राजा भरत और सम्राट अशोक। लेकिन वक्त के साथ इनकी महानता का इतिहास में कम ही उल्लेख होता है। ऐसे ही दो महान राजाओं के बारे में जानिए संक्षिप्त में।

: लगभग 3400 वर्ष ईसा पूर्व भारत के उत्तरी इलाके पर जो पांच नदियों का स्थल बोला जाता था उस पर 'सुदास' नामक राजा का राज्य था। इस कहा जाता था। हालांकि कुछ विद्वानों के अनुसार रामायण काल में हुए थे राजा सुदास, क्योंकि उनकी चर्चा ऋग्वेद में मिलती है जिन्होंने का लड़ा था। सुदास का संबंध इक्ष्वाकु वंश से था।

सम्राट दिवोदास का पुत्र था राजा सुदास। तुत्सु राजा दिवोदास एक बहुत ही शक्तिशाली राजा था जिसने संबर नामक राजा को हराने के बाद उसकी हत्या कर दी थी। बाद में धीरे-धीरे वहां कई छोड़े बड़े 10 राज्य बन गए थे। वे दस राजा एकजुट होकर रहते थे लेकिन दिवोदास के पुत्र सुदास ने फिर से इन पर आक्रमण कर दिया।


संवरण : सम्राट भरत के समय में राजा हस्ति हुए जिन्होंने अपनी राजधानी हस्तिनापुर बनाई। राजा हस्ति के पुत्र अजमीढ़ को पंचाल का राजा कहा गया है। राजा अजमीढ़ के वंशज राजा संवरण जब हस्तिनापुर के राजा थे तो पंचाल में उनके समकालीन राजा सुदास का शासन था। राजा संवरण ने सूर्य की पुत्री ताप्ती से विवाह किया था जिससे कुरु का जन्म हुआ था।

दोनों के बीच हुआ था युद्ध : राजा सुदास का संवरण से युद्ध हुआ जिसे कुछ विद्वान ऋग्वेद में वर्णित 'दाशराज्ञ युद्ध' से जानते हैं। भारतों के कबीले का राजा था सुदास जो अपने ही कुल के अन्य कबीले से लड़ा था। माना जाता है कि वह पुरु, यदु, तुर्वश, अनु, द्रुह्मु, अलिन, पक्थ, भलान, शिव एवं विषाणिन कबीले सहित कई जनजातियों के लोगों से लड़ा था। कहते हैं कि इस युद्ध का एक कारण परुष्णी नदी के जल का बंटवारा भी था।

दाशराज्ञ के युद्ध में एक ओर जहां सुदास की ओर से सलाहकार ऋषि वशिष्ठ थे तो दूसरी ओर संवरण के सलाहकार ऋषि विश्वामित्र थे। कहते हैं कि शुरू में विश्‍वामित्र सुदास के पुरोहित थे पर बाद में सुदास ने विश्‍वामित्र को हटाकर वशिष्‍ठ को नियुक्त कर लिया था। बदला लेने की भावना से विश्वामित्र ने दस राजाओं के एक कबिलाई संघ का गठन किया और फिर हुआ दशराज्ञ का युद्ध। इस युद्ध में इंद्र और वशिष्ट की संयुक्त सेना के हाथों विश्‍वामित्र की सेना को पराजय का मुंह देखना पड़ा था।

यमुना किनारे तीन राजाओं से लड़ाई के बाद सुदास ने अपने राज्य की सीमा उत्तर में पांचाल के दोआब, गंगा किनारे और सरस्वती नदी के इलाके पर भी कब्जा जमाया। राजा सुदास के समय पंचाल राज्य का विस्तार हुआ। राजा सुदास के बाद उसके पोते राजा सोमक को भी उन लोगों से लड़ाई लड़नी पड़ी थी क्योंकि सिंधु पार करके कबीले में बसे लोग वापस सप्त सिंधु के इस पार के समृद्ध इलाके में आकर अधिपत्य जमाना चाहते थे। कहते हैं कि हारकर जो लोग सिंधु पार चले गए थे उन्होंने ही पार्थी, पर्सियन, बलोच, पख्तून और पिशक (कुर्द) राज्य की नींव रखी।

कहते हैं कि बाद में संवरण के पुत्र कुरु ने शक्ति बढ़ाकर पंचाल राज्य को अपने अधीन कर लिया तभी यह राज्य संयुक्त रूप से 'कुरु-पंचाल' कहलाया। परन्तु कुछ समय बाद ही पंचाल पुन: स्वतन्त्र हो गया।


यह भी कहा जाता है कि सुदास की पत्नी के सौतेले भाई राजा अनु ने भारत के और विदेशों के अन्य राजाओं को मिला के एक सेना तैयार की और राजा सुदास के राज्य को हड़पने के लिए सभी को एकजुट किया। अनु को ऋ‍ग्वेद में कहीं-कहीं आनव भी कहा गया है। कुछ इतिहासकारों के अनुसार यह कबीला परुष्णि नदी (रावी नदी) क्षेत्र में बसा हुआ था। आगे चलकर सौवीर, कैकेय और मद्र कबीले इन्हीं आनवों से उत्पन्न हुए थे।




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