क्या वेदों में पशुबलि, मांसाहार आदि का विधान है?

Last Updated: मंगलवार, 20 अक्टूबर 2015 (11:54 IST)
-विवेक आर्य 
 
वेदों के विषय में सबसे अधिक प्रचलित अगर कोई शंका है तो वह है कि क्या वेदों में पशुबलि, आदि का विधान है? RJD नेता रघुवंश प्रसाद द्वारा दिया गया बयान कि प्राचीन ऋषि-मुनि खाते थे, भी इसी भ्रांति को बढ़ावा देने वाला है। इस लेख के माध्यम से आप इन प्रश्नों का उत्तर सहजता से पा सकते हैं।
इस भ्रांति के होने के मुख्य-मुख्य कुछ कारण हैं। सर्वप्रथम तो पाश्चात्य विद्वानों जैसे मैक्समुलर [i], ग्रिफ्फिथ [ii] आदि द्वारा यज्ञों में पशुबलि, मांसाहार आदि का विधान मानना, द्वितीय मध्य काल के आचार्यों जैसे सायण [iii], महीधर [iv] आदि का यज्ञों में पशुबलि का समर्थन करना, तीसरा ईसाइयों, मुसलमानों आदि द्वारा मांसभक्षण के समर्थन में वेदों की साक्षी देना [v], चौथा साम्यवादी अथवा नास्तिक विचारधारा [vi] के समर्थकों द्वारा सुनी-सुनाई बातों को बिना जांचे बार-बार रटना।
 
किसी भी सिद्धांत अथवा किसी भी तथ्य को आंख बंद कर मान लेना बुद्धिमान लोगों का लक्षण नहीं है। हम वेदों के सिद्धांत की परीक्षा वेदों की साक्षी द्वारा करेंगे जिससे कि हमारी भ्रांति का निराकरण हो सके। 
 
शंका 1. क्या वेदों में मांसभक्षण का विधान है?
समाधान : वेदों में मांसभक्षण का स्पष्ट निषेध किया गया है। अनेक वेद मंत्रों में स्पष्ट रूप से किसी भी प्राणी को मारकर खाने का स्पष्ट निषेध किया गया हैं, जैसे 
 
हे मनुष्यों! जो गौ आदि पशु हैं वे कभी भी हिंसा करने योग्य नहीं हैं। -यजुर्वेद 1।1
 
जो लोग परमात्मा के सहचरी प्राणीमात्र को अपनी आत्मा का तुल्य जानते हैं अर्थात जैसे अपना हित चाहते हैं, वैसे ही अन्यों में भी व्रतते हैं। -यजुर्वेद 40।7
 
हे दांतों तुम चावल खाओ, जौ खाओ, उड़द खाओ और तिल खाओ। तुम्हारे लिए यही रमणीय भोज्य पदार्थों का भाग है। तुम किसी भी नर और मादा की कभी हिंसा मत करो। -अथर्ववेद 6।140।2
 
वह लोग जो नर और मादा, भ्रूण और अंडों के नाश से उपलब्ध हुए मांस को कच्चा या पकाकर खाते हैं, हमें उनका विरोध करना चाहिए। -अथर्ववेद 8।6।23
 
निर्दोषों को मारना निश्चित ही महापाप है, हमारे गाय, घोड़े और पुरुषों को मत मार। -अथर्ववेद 10।1।29
 
इन मंत्रों में स्पष्ट रूप से यह संदेश दिया गया है कि वेदों के अनुसार मांसभक्षण निषेध है। 
 
शंका 2. क्या वेदों के अनुसार यज्ञों में पशुबलि का विधान है?
समाधान : यज्ञ की महता का गुणगान करते हुए वेद कहते हैं कि सत्यनिष्ठ विद्वान लोग यज्ञों द्वारा ही पूजनीय परमेश्वर की पूजा करते हैं। [vii]
 
यज्ञों में सब श्रेष्ठ धर्मों का समावेश होता है। यज्ञ शब्द जिस यज् धातु से बनता है। उसके देवपूजा, संगतिकरण और दान हैं इसलिए यज्ञों वै श्रेष्ठतमं कर्म [viii] एवं यज्ञो हि श्रेष्ठतमं कर्म [ix] इत्यादि कथन मिलते हैं। यज्ञ न करने वाले के लिए वेद कहते हैं कि जो यज्ञमयी नौका पर चढ़ने में समर्थ नहीं होते वे कुत्सित, अपवित्र आचरण वाले होकर यही इस लोक में नीचे-नीचे गिरते जाते हैं। [x] 
 
एक ओर वेद यज्ञ की महिमा को परमेश्वर की प्राप्ति का साधन बताते हैं दूसरी ओर वैदिक यज्ञों में पशुबलि का विधान भ्रांत धारणा मात्र है।
 
यज्ञ में पशुबलि का विधान मध्यकाल की देन है। प्राचीनकाल में यज्ञों में पशुबलि आदि प्रचलित नहीं थे। मध्यकाल में जब गिरावट का दौर आया तब मांसाहार, शराब आदि का प्रयोग प्रचलित हो गया। 
 
सायण, महीधर आदि के वेद भाष्य में मांसाहार, हवन में पशुबलि, गाय, अश्व, बैल आदि का वध करने की अनुमति थी जिसे देखकर मैक्समुलर, विल्सन [xi], ग्रिफ्फिथ आदि पाश्चात्य विद्वानों ने वेदों से मांसाहार का भरपूर प्रचार कर न केवल पवित्र वेदों को कलंकित किया अपितु लाखों निर्दोष प्राणियों को मरवाकर मनुष्य जाति को पापी बना दिया। 
 
मध्यकाल में हमारे देश में वाम मार्ग का प्रचार हो गया था, जो मांस, मदिरा, मैथुन, मीन आदि से मोक्ष की प्राप्ति मानता था। आचार्य सायण आदि यूं तो विद्वान थे, पर वाम मार्ग से प्रभावित होने के कारण वेदों में मांसभक्षण एवं पशु बलि का विधान दर्शा बैठे। 
 
निरीह प्राणियों के इस तरह कत्लेआम एवं बोझिल कर्मकांड को देखकर ही महात्मा बुद्ध [xii] एवं महावीर ने वेदों को हिंसा से लिप्त मानकर उन्हें अमान्य घोषित कर दिया जिससे वेदों की बड़ी हानि हुई एवं अवैदिक मतों का प्रचार हुआ जिससे क्षत्रिय धर्म का नाश होने से देश को गुलामी सहनी पड़ी। 
 
इस प्रकार वेदों में मांसभक्षण के गलत प्रचार के कारण देश की कितनी हानि हुई, इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। एक ओर वेदों में जीव रक्षा और निरामिष भोजन का आदेश है तो दूसरी ओर उसके विपरीत उन्हीं वेदों में पशु आदि की यज्ञों में बलि तर्क संगत नहीं लगती है। 
 
स्वामी दयानंद [xiii] ने वेदभाष्य में मांसभक्षण, पशुबलि आदि को लेकर जो भ्रांति देश में फैली थी, उसका निवारण कर साधारण जनमानस के मन में वेद के प्रति श्रद्धाभाव उत्पन्न किया। वेदों में यज्ञों में पशुबलि के विरोध में अनेक मंत्रों का विधान हैं, जैसे- 
 
यज्ञ के विषय में अध्वर शब्द का प्रयोग वेद मंत्रों में हुआ है जिसका अर्थ निरुक्त [xiv] के अनुसार हिंसारहित कर्म है। 
 
हे ज्ञानस्वरूप परमेश्वर, तू हिंसारहित यज्ञों (अध्वर) में ही व्याप्त होता है और ऐसे ही यज्ञों को सत्यनिष्ठ विद्वान लोग सदा स्वीकार करते हैं। -ऋग्वेद 1/1/4 
 
यज्ञ के लिए अध्वर शब्द का प्रयोग ऋग्वेद 1/1/8, ऋग्वेद 1/14/21,ऋग्वेद 1/128/4 ऋग्वेद 1/19/1, ऋग्वेद 3/21/1, सामवेद 2/4/2, अथर्ववेद 4/24/3, अथर्ववेद 1/4/2 इत्यादि मंत्रों में इसी प्रकार से हुआ है। अध्वर शब्द का प्रयोग चारों वेदों में अनेक मंत्रों में होना हिंसारहित यज्ञ का उपदेश है। 
 
हे प्रभु! मुझे सब प्राणी मित्र की दृष्टि से देखें, मैं सब प्राणियों को मित्र की प्रेममय दृष्टि से देखूं, हम सब आपस में मित्र की दृष्टि से देखें। -यजुर्वेद 36/18
 
यज्ञ को श्रेष्ठतम कर्म के नाम से पुकारते हुए उपदेश है कि पशुओं की रक्षा करें। -यजुर्वेद 1 /1 
 
पति-पत्नी के लिए उपदेश है कि पशुओं की रक्षा करें। -यजुर्वेद 6/11 
 
हे मनुष्य, तू दो पैर वाले अर्थात अन्य मनुष्यों एवं चार पैर वाले अर्थात पशुओं की भी सदा रक्षा कर। -यजुर्वेद 14 /8
 
चारों वेदों में दिए गए अनेक मंत्रों से यह सिद्ध होता है कि यज्ञों में हिंसारहित कर्म करने का विधान है एवं मनुष्य को अन्य पशु-पक्षियों की रक्षा करने का स्पष्ट आदेश है।
 
शंका 3. क्या वेदों में वर्णित अश्वमेध, नरमेध, अजमेध, गोमेध में घोड़ा, मनुष्य, गौ की यज्ञों में बलि देने का विधान नहीं है? मेध का मतलब है मारना जिससे यह सिद्ध होता है?
 
समाधान : मेध शब्द का अर्थ केवल हिंसा नहीं है। मेध शब्द के 3 अर्थ हैं- 1. मेधा अथवा शुद्ध बुद्धि को बढ़ाना, 2. लोगों में एकता अथवा प्रेम को बढ़ाना, 3. हिंसा। इसलिए मेध से केवल हिंसा शब्द का अर्थ ग्रहण करना उचित नहीं है। 
 
जब यज्ञ को अध्वर अर्थात ‘हिंसारहित' कहा गया है तो उसके संदर्भ में ‘मेध' का अर्थ हिंसा क्यों लिया जाए? बुद्धिमान व्यक्ति ‘मेधावी' कहे जाते हैं और इसी तरह लड़कियों का नाम मेधा, सुमेधा इत्यादि रखा जाता है, तो क्या ये नाम क्या उनके हिंसक होने के कारण रखे जाते हैं? या बुद्धिमान होने के कारण?
 
अश्वमेध शब्द का अर्थ यज्ञ में अश्व की बलि देना नहीं है अपितु शतपथ 13.1.6.3 और 13.2.2.3 के अनुसार राष्ट्र के गौरव, कल्याण और विकास के लिए किए जाने वाले सभी कार्य 'अश्वमेध' है [xv]। 
 
गौमेध का अर्थ यज्ञ में गौ की बलि देना नहीं है अपितु अन्न को दूषित होने से बचाना, अपनी इन्द्रियों को वश में रखना, सूर्य की किरणों से उचित उपयोग लेना, धरती को पवित्र या साफ रखना ‘गोमेध' यज्ञ है। ‘गो’ शब्द का एक और अर्थ है पृथ्वी। पृथ्वी और उसके पर्यावरण को स्वच्छ रखना ‘गोमेध’ कहलाता है। [xvi] 
 
नरमेध का अर्थ है मनुष्य की बलि देना नहीं है अपितु मनुष्य की मृत्यु के बाद उसके शरीर का वैदिक रीति से दाह-संस्कार करना नरमेध यज्ञ है। मनुष्यों को उत्तम कार्यों के लिए प्रशिक्षित एवं संगठित करना नरमेध या पुरुषमेध या नृमेध यज्ञ कहलाता है।
 
अजमेध का अर्थ बकरी आदि की यज्ञ में बलि देना नहीं है अपितु अज कहते हैं बीज, अनाज या धान आदि कृषि की पैदावार बढ़ाना है। अजमेध का सीमित अर्थ अग्निहोत्र में धान आदि की आहुति देना है। [xvii]
 
शंका 4 : यजुर्वेद मंत्र 24/29 में हस्तिन आलभते अर्थात हाथियों को मारने का विधान है।
समाधान : 'लभ्’ धातु से बनने वाले आलम्भ शब्द का अर्थ मारना नहीं अपितु अच्छी प्रकार से प्राप्त करना, स्पर्श करना या देना होता है। हस्तिन शब्द का अर्थ अगर हाथी लें तो इस मंत्र में राजा को अपने राज्य के विकास हेतु हाथी आदि को प्राप्त करना, अपनी सेनाओं को सुदृढ़ करना बताया गया है। यहां पर हिंसा का कोई विधान नहीं है।
 
पारस्कर सूत्र 2 /2/16 में कहा गया है कि आचार्य ब्रह्मचारी का आलम्भ अर्थात हृदय का स्पर्श करता है। यहां पर आलम्भ का अर्थ स्पर्श आया है। 
 
पारस्कर सूत्र 1/8/8 में ही आया है कि वर वधू के दक्षिण कंधे के ऊपर हाथ ले जाकर उसके हृदय का स्पर्श करे। यहां पर भी आलम्भ का अर्थ स्पर्श आया है। 
 
अगर यहां पर आलम्भ शब्द का अर्थ मारना ग्रहण करें तो यह कैसे युक्तिसंगत एवं तर्कसंगत सिद्ध होगा? इससे सिद्ध होता है कि आलम्भ शब्द का अर्थ ग्रहण करना, प्राप्त करना अथवा स्पर्श करना है।
 
शंका 5 : वेद, ब्राह्मण एवं सूत्र ग्रंथों में संज्ञपन शब्द आया है जिसका अर्थ पशु को मारना है?
समाधान : संज्ञपन शब्द का अर्थ है ज्ञान देना, दिलाना तथा मेल कराना। अथर्ववेद 6/10/14-15 में लिखा है कि तुम्हारे मन का ज्ञानपूर्वक अच्छी प्रकार (संज्ञपन) मेल हो, तुम्हारे हृदयों का ज्ञानपूर्वक अच्छी प्रकार (संज्ञपन) मेल हो। 
 
इसी प्रकार शतपथ ब्राह्मण 1/4 में एक आख्यानिका है जिसका अर्थ है- मैं वाणी तुझ मन से अधिक अच्छी हूं, तू जो कुछ मन में चिंतन करता है मैं उसे प्रकट करती हूं, मैं उसे अच्छी प्रकार से दूसरों को जतलाती हूं (संज्ञपयामी)। संज्ञपन शब्द का मेल के स्थान पर हिंसापरक अर्थ करना अज्ञानता का परिचायक है।
 
शंका 6 : वेदों में गोघ्न अर्थात गायों के वध करने का आदेश है। 
समाधान : गोघ्न शब्द में हन धातु का प्रयोग है जिसके दो अर्थ बनते हैं हिंसा और गति। गोघ्न में उसका गति अथवा ज्ञान, गमन, प्राप्ति विषयक अर्थ है। मुख्य भाव यहां प्राप्ति का है अर्थात जिसे उत्तम गौ प्राप्त कराई जाए।
 
हिंसा के प्रकरण में वेद का उपदेश गौ की हत्या करने वाले से दूर रहने का है। 
ऋग्वेद 1/114 /10 में लिखा है, जो गोघ्न (गौ की हत्या करने वाला) है, वह नीच पुरुष है। वह तुमसे दूर ही रहे।
 
वेदों के कई उदाहरणों से पता चलता है कि ‘हन्’ का प्रयोग किसी के निकट जाने या पास पहुंचने के लिए भी किया जाता है। उदाहरण में अथर्ववेद 6/101/1 में पति को पत्नी के पास जाने का उपदेश है।
 
इस मंत्र का यह अर्थ कि पति पत्नी के पास जाए उचित प्रतीत होता है न कि पति द्वारा पत्नी को मारना उचित सिद्ध होता है इसलिए हनन का केवल हिंसा अर्थ गलत परिप्रेक्ष्य में प्रयोग करना भ्रम फैलाने के समान है।
 
शंका 7. वेदों में अतिथि को भोजन में गौ आदि का मांस पकाकर खिलाने का आदेश है। 
समाधान- ऋग्वेद के मंत्र 10/68 /3 में अतिथिनीर्गा: का अर्थ अतिथियों के लिए गौए किया गया है जिसका तात्पर्य यह प्रतीत होता है कि किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति के आने पर गौ को मारकर उसके मांस से उसे तृप्त किया जाता था। 
 
यहां पर जो भ्रम हुआ है उसका मुख्य कारण अतिथिनी शब्द को समझने की गलती के कारण हुआ है। यहां पर उचित अर्थ बनता है ऐसी गौएं जो अतिथियों के पास दानार्थ लाई जाएं, उन्हें दान की जाएं।
 
Monier Williams ने भी अपनी संस्कृत-इंग्लिश शब्दकोश में अतिथिग्व का अर्थ "To whom guests should go" (P.14) अर्थात जिसके पास अतिथि प्रेमवश जाएं ऐसा किया है। श्री Bloomfield ने भी इसका अर्थ "Presenting to guests" अर्थात अतिथियों को गौएं भेंट करने वाला ही किया है। अतिथि को गौमांस परोसना कपोल-कल्पित है। [xviii]
 
शंका 8. वेदों में बैल को मारकर खाने का आदेश है? 
समाधान- यह भी एक भ्रांति है कि वेदों में बैल को खाने का आदेश है। वेदों में जैसे गौ के लिए अघन्या अर्थात न मारने योग्य शब्द का प्रयोग है उसी प्रकार से बैल के लिए अघ्न्य शब्द का प्रयोग है।
 
यजुर्वेद 12/73 में अघन्या शब्द का प्रयोग बैल के लिए हुआ है। इसकी पुष्टि सायणाचार्य ने काण्वसंहिता में भी की है। इसी प्रकार से अथर्ववेद 9/4/17 में लिखा है कि बैल सींगों से अपनी रक्षा स्वयं करता है, परंतु मानव समाज को भी उसकी रक्षा में भाग लेना चाहिए। 
 
अथर्ववेद 9/4/19 मंत्र में बैल के लिए अघन्य और गौ के लिए अघन्या शब्दों का वर्णन मिलता है। यहां पर लिखा है कि ब्राह्मणों को ऋषभ (बैल) का दान करके यह दाता अपने को स्वार्थ त्याग द्वारा श्रेष्ठ बनाता है। वह अपनी गोशाला में बैलों और गौओं की पुष्टि देखता है। 
 
अथर्ववेद 9/4/20 मंत्र में जो सत्पात्र में वृषभ (बैल) का दान करता है उसकी गौएं संतान आदि उत्तम रहती हैं। 
 
इन उदाहरणों से यह सिद्ध होता है कि गौ के साथ-साथ बैल की रक्षा का वेद संदेश देते हैं।
 
शंका 9. वेद में वशा/ वंध्या अर्थात वृद्ध गौ अथवा बैल (उक्षा) को मारने का विधान है? 
समाधान- शंका का कारण ऋग्वेद 8/43/11 मंत्र के अनुसार वन्ध्या गौओं की अग्नि में आहुति देने का विधान बताया गया है। यह सर्वथा अशुद्ध है। 
 
इस मंत्र का वास्तविक अर्थ निघण्टु 3/3 के अनुसार यह है कि जैसे महान सूर्य आदि भी जिसके प्रलयकाल में (वशा) अन्न व भोज्य के समान हो जाते हैं, इसका शतपथ 5/1/3 के अनुसार अर्थ है पृथ्वी भी जिसके (वशा) अन्न के समान भोज्य है ऐसे परमेश्वर की नमस्कारपूर्वक स्तुतियों से सेवा करते हैं। 
 
वेदों के विषय में इस भ्रांति के होने का मुख्य कारण वशा, उक्षा, ऋषभ आदि शब्दों के अर्थ न समझ पाना है। यज्ञ प्रकरण में उक्षा और वशा दोनों शब्दों के औषधिपरक अर्थ का ग्रहण करना चाहिए जिन्हें अग्नि में डाला जाता है। सायणाचार्य एवं मोनियर विलियम्स के अनुसार उक्षा शब्द के अर्थ सोम, सूर्य, ऋषभ नामक औषधि है। 
 
वशा शब्द के अन्य अर्थ अथर्ववेद 1/10/1 के अनुसार ईश्वरीय नियम वा नियामक शक्ति है। शतपथ 1/8/3/15 के अनुसार वशा का अर्थ पृथ्वी भी है। अथर्ववेद 20/103/15 के अनुसार वशा का अर्थ संतान को वश में रखने वाली उत्तम स्त्री भी है। 
 
इस सत्यार्थ को न समझकर वेद मंत्रों का अनर्थ करना निंदनीय है।
 
शंका 10. वेदादि धर्मग्रंथों में माष शब्द का उल्लेख हैं जिसका अर्थ मांस खाना है। 
समाधान- माष शब्द का प्रयोग ‘माषौदनम्' के रूप में हुआ है। इसे बदलकर किसी मांसभक्षी ने मांसौदनम् अर्थ कर दिया है। यहां पर माष एक दाल के समान वर्णित है इसलिए यहां मांस का तो प्रश्न ही नहीं उठता। 
 
आयुर्वेद (सुश्रुत संहिता शरीर अध्याय 2) गर्भवती स्त्रियों के लिए मांसाहार को सख्त मना करता है और उत्तम संतान पाने के लिए माष (दाल) सेवन को हितकारी कहता है। इससे क्या स्पष्ट होता है। यही कि माष शब्द का अर्थ मांसाहार नहीं अपितु दाल आदि को खाने का आदेश है। फिर भी अगर कोई माष को मांस ही कहना चाहे, तब भी मांस को निरुक्त 4/1/3 के अनुसार मनन साधक, बुद्धिवर्धक और मन को अच्छी लगने वाली वास्तु जैसे फलका गूदा, खीर आदि कहा गया है। प्राचीन ग्रंथों में मांस अर्थात गूदा खाने के अनेक प्रमाण मिलते है, जैसे चरक संहिता देखे में आम्रमांसं (आम का गूदा), खजूरमांसं (खजूर का गूदा), तैत्तरीय संहिता 2.32.8 (दही, शहद और धान) को मांस कहा गया है। 
 
इससे यही सिद्ध होता है कि वेदादि शास्त्रों में जहां पर माष शब्द आता है अथवा मांस के रूप में भी जिसका प्रयोग हुआ है उसका अर्थ दाल अथवा फलों का मध्य भाग अर्थात गूदा है।
 
शंका 11. वेदों में यज्ञ में घोड़े की बलि देने का और घोड़े का मांस पकाने का वेदों में आदेश है। 
समाधान- यजुर्वेद के 25 अध्याय में सायण, महीधर, उव्वट, ग्रिफ्फिथ, मैक्समुलर आदि ने अश्व हिंसापरक अर्थ किए हैं। इसका मुख्य कारण वाजिनम् शब्द के अर्थ को न समझना है। वाजिनम् का अश्व के साथ-साथ अन्य अर्थ है शूर, बलवान, गतिशील और तेज। 
 
यजुर्वेद के 25/34 मंत्र का अर्थ करते हुए सायण लिखते हैं कि अग्नि से पकाए, मरे हुए तेरे अवयवों से जो मांस-रस उठता है वह भूमि या तृण पर न गिरे, वह चाहते हुए देवों को प्राप्त हो। 
 
इस मंत्र का अर्थ स्वामी दयानंद वेद भाष्य में लिखते हैं- हे मनुष्य, जो ज्वर आदि से पीड़ित अंग हो उन्हें वैद्यजनों से निरोग कराना चाहिए। चूंकि उन वैद्यजनों द्वारा जो औषध दी जाती है वह रोगीजन के लिए हितकारी होती है एवं मनुष्य को व्यर्थ वचनों का उच्चारण न करना चाहिए, किंतु विद्वानों के प्रति उत्तम वचनों का ही सदा प्रयोग करना चाहिए। 
 
अश्व की हिंसा के विरुद्ध यजुर्वेद 13/47 मंत्र का शतपथकार ने पृष्ठ 668 पर अर्थ लिखा है कि अश्व की हिंसा न कर। 
 
यजुर्वेद 25/44 के यज्ञ में घोड़े की बलि के समर्थन में अर्थ करते हुए सायण लिखते हैं कि हे अश्व! तू अन्य अश्वों की तरह मरता नहीं, चूंकि तुझे देवत्व प्राप्ति होगी और न हिंसित होता है, क्यूंकि व्यर्थ हिंसा का यहां अभाव है। प्रत्यक्ष रूप में अवयव नाश होते हुए ऐसा कैसे कहते हो? इसका उत्तर देते हैं कि सुंदर देवयान मार्गों से देवों को तू प्राप्त होता है इसलिए यह हमारा कथन सत्य है। इस मंत्र का स्वामी दयानंद अर्थ करते हैं कि जैसे विद्या से अच्छे प्रकार प्रयुक्त अग्नि, जल, वायु इत्यादि से युक्त रथ में स्थित होकर मार्गों से सुख से जाते हैं, वैसे ही आत्मज्ञान से अपने स्वरूप को नित्य जान के मरण और हिंसा के डर को छोड़कर दिव्य सुखों को प्राप्त हो। 
 
पाठक स्वयं विचार करें ‍कि कहां स्वामी दयानंद द्वारा किया गया सच्चा उत्तम अर्थ और कहां सायण आदि के हिंसापरक अर्थ। दोनों में आकाश-पाताल का भेद है। ऐसा ही भेद वेद के उन सभी मंत्रों में है जिनका अर्थ हिंसापरक रूप में किया गया है अत: वे मानने योग्य नहीं हैं।
 
शंका 12. क्या वेदों के अनुसार इंद्र देवता बैल खाता है?
समाधान- इंद्र द्वारा बैल खाने के समर्थन में ऋग्वेद 10/28/3 और 10/86/14 मंत्र का उदाहरण दिया जाता है। यहां पर वृषभ और उक्षन् शब्दों के अर्थ से अनभिज्ञ लोग उनका अर्थ बैल कर देते हैं। ऋग्वेद में लगभग 20 स्थलों पर अग्नि को, 65 स्थलों पर इंद्र को, 11 स्थलों पर सोम को, 3 स्थलों पर पर्जन्य को, 5 स्थलों पर बृहस्पति को, 5 स्थलों पर रुद्र को वृषभ कहा गया है [xix]। व्याख्याकारों के अनुसार वृषभ का अर्थ यज्ञ है। 
 
उक्षन् शब्द का अर्थ ऋग्वेद में अग्नि, सोम, आदित्य, मरुत आदि के लिए प्रयोग हुआ है। जब वृषभ और उक्षन् शब्दों के इतने सारे अर्थ वेदों में दिए गए हैं, तब उनका व्यर्थ ही बैल अर्थ कर उसे इंद्र को खिलाना युक्तिसंगत एवं तर्कपूर्ण नहीं है। 
 
इसी संदर्भ में ऋग्वेद में इंद्र के भोज्य पदार्थ निरामिषरूपी धान, करम्भ, पुरोडाश तथा पेय सोमरस है, न कि बैल को बताया गया है। [xx]
 
शंका 13. वेदों में गौ का क्या स्थान है?
समाधान- यजुर्वेद 8/43 में का नाम इडा, रंता, हव्या, काम्या, चन्द्रा, ज्योति, अदिति, सरस्वती, महि, विश्रुति और अघन्या [xxi] कहा गया है। स्तुति की पात्र होने से इडा, रमयित्री होने से रंता, इसके दूध की यज्ञ में आहुति दी जाने से हव्या, चाहने योग्य होने से काम्या, हृदय को प्रसन्न करने से चन्द्रा, अखंडनीय होने से अदिति, दुग्धवती होने से सरस्वती, महिमशालिनी होने से महि, विविध रूप में श्रुत होने से विश्रुति तथा न मारी जाने योग्य होने से अघन्या [xxii] कहलाती है [xxiii]।
 
अघन्या शब्द में गाय का वध न करने का संदेश इतना स्पष्ट है कि विदेशी लेखक भी उसे भली प्रकार से स्वीकार करते हैं। [xxiv]
 
हे गौओं, तुम पूज्य हो, तुम्हारी पूज्यता मैं भी प्राप्त करूं। -यजुर्वेद 3/20
 
मैं समझदार मनुष्य को कहे देता हूं कि तू बेचारी बेकसूर गाय की हत्या मत कर, वह अदिति है काटने-चीरने योग्य नहीं है। -ऋग्वेद 8/101/15
 
उस देवी गौ को मनुष्य अल्प बुद्धि होकर मारे-काटे नहीं। -ऋग्वेद 8/101/16
निरपराध की हत्या बड़ी भयंकर होती है अत: तू हमारे गाय, घोड़े और पुरुष को मत मार। -अथर्ववेद 10/1/29
 
गौएं वधशाला में न जाएं। -ऋग्वेद 6/28/4
गाय का वध मत कर। -यजुर्वेद 13/43



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