हमारी सभ्यता का आईना हैं हमारे शहर

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शहरों में अतिक्रमण और अवैध निर्माण बड़े पैमाने पर हो रहे हैं। भूमि व निर्माण माफिया उठ खड़े हुए हैं। शहरी अपराध पहले से अधिक परिष्कृत और चालाकीपूर्ण हो गए हैं। नगर निकायों में भ्रष्टाचार कई गुना बढ़ गया है। शहरों के प्रशासन के लिए सुसंगत, समन्वित तथा जीवंत व्यवस्था की दरकार होती है मगर हमारे शहरों के पास हैं विखंडित, विभंजित और जड़बुद्धि प्राधिकारी, जो किसी भी समस्या से दो-दो हाथ करने में अक्षम हैं

शहर राष्ट्र की आध्यात्मिक कार्यशालाएँ होते हैं। वे लोगों के मन और उत्प्रेरण का आईना होते हैं। एक पुरानी कहावत है, 'मुझे अपने शहर बताओ, मैं तुम्हें तुम्हारे सांस्कृतिक लक्ष्यों के बारे में बताऊँगा।' शहर सभ्यताओं को आकार देते हैं और सभ्यताएँ शहरों को। शहर और सभ्यता इस कदर एक-दूसरे में गुत्थम-गुत्था होते हैं कि एक के बिना दूसरे की कल्पना भी नहीं की जा सकती। बीमार और अमानवीय सभ्यताएँ रुग्ण एवं निष्प्राण शहरों को ही जन्म देती हैं और ऐसे शहर सभ्यताओं की दूषितता व दिग्भ्रमितता को ही बढ़ाते हैं। दोनों एक-दूसरे की कमजोरियों को पुष्ट करते हैं। एक दुश्चक्र चल पड़ता है। आज के शहरी भारत की त्रासदी इसी दुश्चक्र में निहित है। हम अपने आसपास जो कूड़ा-करकट, प्रदूषण, झोपड़पट्टियाँ, अतिक्रमण आदि देख रहे हैं, वह हमारी सभ्यतागत खामियों तथा हमारे शहरों की खामियों का मिला-जुला नतीजा ही हैं।

हमारी शहरी प्रशासनिक मशीनरी ने सभ्यताओं और शहरों के बीच मौजूद गहरे अंतर्संबंधों की ओर से आँखें मूँद ली हैं। उसने शहरों की सतह के नीचे बहने वाले सभ्यता के प्रवाह के शुद्धिकरण के लिए कुछ नहीं किया है। न ही वह तीव्र शहरीकरण के विश्वव्यापी चलन से उठ खड़ीहुई चुनौतियों को ठीक तरह समझ सकी है। शहरी तथा ग्रामीण बसाहटों में एक साथ जनसंख्या वृद्धि की भारतीय विशेषता की ओर भी ध्यान नहीं दिया गया है। कड़ा अनुशासन लागू करने, कार्यान्वयन मशीनरी को कारगर बनाने और नए वित्तीय, तकनीकी तथा प्रबंधकीय संसाधनों की तलाश के मामले में भी यही स्थिति है। पूरा मामला कमतर दूरदृष्टि, उदासीन समझ तथा व्यापक लापरवाही का है।

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जगमोहपूर्व केंद्रीय शहरी विकास मंत्र
यह तो काफी हद तक निश्चितता के साथ कहा जा सकता है कि इक्कीसवीं सदी का विश्व शहरी विश्व होगा। 1950 से 1990 के बीच शहरों का विकास गाँवों की तुलना में दोगुनी से भी ज्यादा गति से हुआ। 1990 से 2000 के दशक में तो विश्व की शहरी आबादी में कोई 83 प्रतिशत वृद्धि हुई।



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