शनैश्चरी अमावस पर धार्मिक अनुष्ठान

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श्रावण अमावस्या को शनि अमावस्या भी है। को मनाने के लिए विशेष पूजा अनुष्ठान हेतु खास तैयारियां की गई हैं। विशेषकर शनि मंदिरों एवं हनुमान मंदिरों में शनैश्चरी अमावस को पूजा पाठ हवन एवं के द्वारा शनि महाराज को प्रसन्न किया जाएगा।

सूर्य पुत्र शनि सौर मंडल में बृहस्पति के बाद सबसे बड़ा ग्रह है। सौर मंडल में सूर्य की परिक्रमा करने वाला शनि छठा ग्रह है। शनि सभी ग्रहों में सबसे सुंदर रंगीन वलयों वाला और 33 चंद्रमा वाला ग्रह है।

इसके श्याम वर्ण होने के कारण सूर्य ने अपना पुत्र मानने से मना कर दिया था। इससे शनि की भावनाओं को ठेस लगी और पुत्र अपने पिता से शत्रु भाव रखने लगा। भगवान सूर्य ने पुत्रों में शनि अपनी भीषणता एवं बल में सर्वोपरि हैं।
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शनि की रुक्षता का कारण पिता का प्यार न मिलना ही है। इन्होंने अपनी मां का तिरस्कार देखा और स्वयं अपना भी। शनि के मन में पिता के प्रति शत्रुता का भाव है, लेकिन सूर्य के मन में कभी ऐसा विचार नहीं आया। फिर भी अनेक कारणों में शनि और सूर्य का संबंध शत्रुवत्‌ ही है।
शनि पश्चिम का स्वामी है, तो सूर्य पूर्व का। शनि शीतल एवं काला है, तो सूर्य उष्ण एवं उज्ज्वल। शनि मृत्यु, दुख, दरिद्रता, बीमारी, कर्ज, तिरस्कार आदि का परिचायक है लेकिन मंत्र पाठ, जाप आदि अनुष्ठानों द्वारा शनि ग्रह अनुकूल होकर महाकृपालु हो जाते हैं।

शनि मंदिरों में शनि अमावस्या को साधना एवं आराधना द्वारा शनि देव का प्रसन्न करने के अनेक अनुष्ठान करेंगे। हजारों की संख्या में भक्तजन प्रातः काल से ही ध्यान मंत्र जाप आदि द्वारा शनि महाराज का विशेष पूजन करेंगे। शनैश्चरी अमावस पर किए जाने वाले तैलाभिषेक में साधक सम्मलित होंगे।

 

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