दीपक असीम
सनावद में गुजरात का अर्थ वही नहीं है, जो दूसरी जगहों पर है। यहां गुजरात लफ्ज एक वली के नाम से जुड़ा हुआ है, इसलिए गुजरात कहते ही यहां आंखों के आगे दहकता हुआ गुजरात नहीं चमेली के फूलों और लोबान की खुशबू से महकता हुआ एक मजार आता है। गुजरात शाह वली का मजार...। गुजरात शाह वली का असल नाम तो कुछ और था, मगर वे चूंकि गुजरात से आए थे, सो नाम पड़ गया गुजरात शाह वली। गुजरात तक वे इराक से आए थे, मगर गुजरात उन्हें जंचा नहीं। यहां आकर ऐसे बसे कि फिर कभी उजडे़ ही नहीं। फिलहाल इस्लामपुरा के मेहबूब चौक में उनका सालाना उर्स चल रहा है। यह उर्स का तेरहवां साल है। पर्दा तो वे बहुत पहले कर गए थे, मगर उनके मुरीदों ने उर्स अभी एक दशक पहले से शुरू किया है। इस साल 4 फरवरी से शुरू हुआ यह उर्स 8 तक चलेगा।
सनावद पर किसी एक सूफी फकीर का साया रहा हो ऐसा नहीं है। और भी सूफियों की कृपा इस छोटे से शहर पर रही है। सूफी फकीरों के ही करम से सनावद की आबो-हवा में नफरत का जहर बिलकुल नहीं है। खंडवा के करीब होने के बावजूद यहां कुछ भी खंडवा की तरह खंडित नहीं है। धार में सांप्रदायिकता की जो धार जाने कितनों की गर्दन पर चलने को आमादा है, यहां आकर कुंद पड़ जाती है। इंदौर जैसा दौर भी यहां कभी नहीं आया कि कर्फ्यू लगा हो और लाशे बिछीं हों। जब हिंदुओं का कोई जुलूस निकलता है, तो उस पर पत्थर नहीं फूल फेंके जाते हैं, स्वागत किया जाता है। सो जब मुस्लिमों का कोई कार्यक्रम होता है, तो उधर से भी 'क्रिया की प्रतिक्रिया' ऐसी ही होती है।
गुजरात शाह वली के नाम की ही बरकत है कि गुजरात से यहां तक आते-आते 'क्रिया की प्रतिक्रिया' सिर के बल खड़ी हो जाती है। यहां बानवे में भी दंगा नहीं हुआ। यहां चौरासी में भी कुछ नहीं हुआ था। न जाने क्यों लंबे अरसे से सनावद सूफी फकीरों की पसंदीदा जगह बना हुआ है। अभी दस साल पहले तक सूफी फकीर गुलशन मां सनावद की गलियों में घूमा करती थीं और पूरा सनावद मानो उनकी संतान जैसा था।
उनकी मजार जलालुद्दीन शाह कादरी की मजार के नीचे है। ऊंची टेकरी पर जलालुद्दीन शाह कादरी की मजार है और इसके उतार पर गुलशन मां की। इस टेकरी को आप सनावद का हैगिंग गार्डन कह सकते हैं। जिस तरह हैंगिग गार्डन से मुंबई नजर आती है उसी तरह इस टेकरी से सनावद पूरा दिखता है।
मुंबई की तरह सनावद में दरिया नहीं, मगर उसकी कमी पूरी करता है आस्था और मुहब्बत का समंदर, जो इन दिनों गुजरात शाह वली के उर्स में उमड़ा हुआ है। गुलशन मां यूं तो मर्द थे। नाम था दलशेर बा। खरगोन से आए थे। मस्त थे, जिन्हें सूफियों की भाषा में मजज़ूब भी कहा जाता है। जिन लोगों ने उन्हें देखा, उनके साथ रहे, वे उनके वाकये बहुत ही श्रद्धा और प्रेम के साथ सुनाते हैं। मां इन्हें इसलिए कहते हैं कि वे सबसे मां की तरह प्यार करते थे। मां की तरह दुआएं देते थे। मां की तरह सबका ध्यान भी रखते थे।
खरगोन से जब ये सनावद आए तो सबसे पहले इनके मुरीद हुए रमजान कव्वाल। सबसे पहले उन्हें मां कहना भी रमजान कव्वाल ने ही कहना शुरू किया। इनकी मज़ार पर मुजाविर भी एक महिला ही है।
शायर जिया राना कई बार गुलशन मां से मिले हैं। वे बताते हैं कि एक बार मैं गुलशन मां के मुरीदों के बीच बैठा था। चाय आई और गुलशन मां सबको उठा-उठाकर चाय देने लगीं। खुद अपने लिए उन्होंने प्लेट में चाय ली। मेरे मन में अचानक एक जिद जागी कि मां मुझे भी प्लेट में चाय पिलाए। फिर मन ही मन कहा कि देखें मां प्लेट में चाय पिलाती हैं या नहीं। मेरा इतना सोचना था कि अम्मा ने मेरी तरफ देखा और बुलाया। कहा कि तू प्लेट में चाय पीना चाहता है ना, ले प्लेट में पी। मेरे रोंगटे खडे़ हो गए कि मेरे मन की बात मां को कैसे मालूम हुई? तबसे मैं भी गुलशन मां का मुरीद हो गया।
सनावद का पुराना नाम गुलशनाबाद ही था। ये नाम औरंगजेब की बेटी गुलशनआरा के नाम पर पड़ा था। औरंगजेब की फौजें यहां टेकरी के नीचे रुका करती थीं। सनावद तो नाम बाद में हुआ। बहरहाल जब खरगोन के दलशेर बा को सब मां कहने लगे तो किसी को सूझा कि इस गुलशनाबाद में मां आई हैं तो क्यों ना उनका नाम गुलशन मां रखा जाए। सो अब उन्हें लोग तरह-तरह से बुलाते हैं- गुलशन मां, गुलशन अम्मा, गुलशन अम्मी...। गुलशन मां जिस मकान में रहा करती थीं, उसे आबकारी पुलिस में काम करने वाले अशोक ज्ञानी ने खरीदा है, जो यहां की दरगाहों पर होने वाले हर मुशायरे और कव्वाली में आखिरी तक बैठते हैं। उन्हें इस बात पर बहुत गर्व है कि जिस मकान में गुलशन मां रहती थीं, वे उसी में रहते हैं और उनके मकान की खिड़की खुलते ही उन्हें गुजरात शाह वली की मजार के दीदार हो जाते हैं।
इंदौर से नौकरी करने गए अशोक ज्ञानी को सनावद जाते ही यह ज्ञान मिल गया कि इससे बेहतर जगह नहीं हो सकती। सो वे वहीं बस गए हैं। बताते हैं कि कहीं तबादला भी हो जाता है, तो अधिकारियों के हाथ-पैर जोड़कर फिर यहीं आ जाता हूं। सनावद तो मेरे लिए घर की तरह हो गया है। उर्स में आने वाले कव्वालों और शायरों को वे अपना मेहमान समझते हैं और सबकी खूब खिदमत भी करते हैं। परसों रात जब सुबह पांच बजे उर्स का मुशायरा खत्म हुआ तो अशोक शायरों की खिदमत के लिए सुबह पांच बजे ही 'दुकान' खुलवाना चाहते थे। बहरहाल लिखना थी यहां उर्स में हुए मुशायरे की रूदाद। मगर बीच में गुलशन मां, जलालुद्दीन शाह और गुजरात शाह वली आ गए। अब इनको छोड़कर उस मुशायरे की बात कैसे की जा सकती है, जो इन्हीं के कदमों की तुफैल में हुआ? वैसे यह हकीकतें शायरी से कम दिलकश तो नहीं हैं, कुछ ज्यादा ही होंगी।