जिउतिया व्रत 2020 : जीवित्पुत्रिका व्रत की पौराणिक मान्यता और मुहूर्त


संतान प्राप्ति हेतु एवं संतान की दीर्घायु होने के लिए सुहागिन महिलाएं करती है जानिए इसका पौराणिक महत्व एवं कैसे कलयुग में मिलता है इसका पूर्ण प्रभाव -
इस वर्ष जीवित्पुत्रिका व्रत 10 सितंबर 2020, को किया जाएगा। हर साल आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को यह व्रत किया जाता है।

जीवित्पुत्रिका व्रत को जितिया या जिउतिया व्रत भी कहा जाता है। सुहागिन स्त्रियां इस दिन निर्जला उपवास करती हैं। महिलाएं अपनी संतान की लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य के लिए इस व्रत को रखती हैं। यह व्रत मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के कई क्षेत्रों में किया जाता है। उत्तर पूर्वी राज्यों में जीवित्पुत्रिका व्रत बहुत लोकप्रिय है।
जीवित्पुत्रिका व्रत एवं पूजा मुहूर्त

आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि का प्रारंभ 09 सितंबर दिन बुधवार को दोपहर 01 बजकर 35 मिनट से हो रहा है, जो 10 सितंबर दिन गुरुवार को दोपहर 03 बजकर 04 मिनट तक है। चूँकि व्रत का समय उदया तिथि में मान्य होगा, ऐसे में जीवित्पुत्रिका व्रत 10 सिंतबर को होगा।


इस व्रत में सूर्योदय से पहले भी मीठा भोजन किया जाता है। इस व्रत में माताएं जीवित्पुत्रिका की पूजा पुत्रों की लम्बी आयु के लिए करती हैं। सूर्य को अर्घ्‍य देने के बाद ही कुछ खाया पिया जा सकता है।

संतान की संख्या के अनुसार चांदी की जिउतिया बनवाकर कलावा में गूंथ कर महिलाएं करती हैं पूजा ।

जिउतिया व्रत की पौराणिक मान्यता -

जितिया व्रत का इतिहास महाभारत के युद्ध में पिता की मौत के बाद अश्वत्थामा बहुत नाराज था। सीने में बदले की भावना लिए वह पांडवों के शिविर में घुस गया। शिविर के अंदर पांच लोग सो रहे थे।अश्वत्थामा ने उन्हें पांडव समझकर मार डाला। कहा जाता है कि सभी द्रौपदी की पांच संतानें थीं।अर्जुन ने अश्वत्थामा को बंदी बनाकर उसकी दिव्य मणि छीन ली। क्रोध में आकर अश्वत्थामा ने अभिमन्यु की पत्नी के गर्भ में पल रहे बच्चे को मार डाला।
ऐसे में भगवान कृष्ण ने अपने सभी पुण्यों का फल उत्तरा की अजन्मी संतान को देकर उसके गर्भ में पल रहे बच्चे को पुन: जीवित कर दिया।भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से जीवित होने वाले इस बच्चे को जीवित्पुत्रिका नाम दिया गया। तभी से संतान की लंबी उम्र और मंगल कामना के लिए हर साल जिउतिया व्रत रखने की परंपरा को निभाया जाता है।

इस व्रत का पूरा प्रभाव कलयुग में भी मिलता है। यह व्रत छठ व्रत की तरह ही निर्जला और निराहार रह कर महिलाएं करती हैं।



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