Cheti Chand 2026: क्यों खास है सिंधी समाज का यह त्योहार? जानिए 5 महत्वपूर्ण बातें
चेटीचंड: आस्था, उल्लास और सिंधी संस्कृति का जीवंत उत्सव
जब चैत्र मास की चांदनी अपनी छटा बिखेरती है, तब सिंधी समाज के लिए खुशियों का नया सवेरा लेकर आता है- चेटीचंड। यह केवल एक कैलेंडर की शुरुआत नहीं, बल्कि वरुण देव के अवतार भगवान झूलेलाल के प्रति अटूट श्रद्धा का प्रतिबिंब है। आइए, इस पावन पर्व की उन गहराइयों में उतरते हैं जो इसे बेहद खास बनाती हैं।
1. बुराई नहीं, अहंकार का अंत: एक महान दर्शन
चेटीचंड का उद्देश्य केवल मन्नत मांगना नहीं, बल्कि उस जीवन दर्शन को अपनाना है जो भगवान झूलेलाल ने दिया था। उन्होंने दमनकारी मिर्ख बादशाह का विनाश करने के बजाय उसका 'मान-मर्दन' किया था। उनका यह संदेश आज भी प्रासंगिक है कि "नफरत बुराई से करो, बुरे इंसान से नहीं।" यह पर्व हमें क्षमा और सुधार की राह दिखाता है।
2. चालीस दिनों की अखंड साधना: चालिया साहिब
इस पर्व की भव्यता 'चालिया' उत्सव में छिपी है। श्रद्धालु लगातार 40 दिनों तक कठिन व्रत और नियम पालते हैं। मान्यता है कि जो पूरी निष्ठा से इन चालीस दिनों तक भगवान की आराधना करता है, वरुण देव स्वयं उसके सारे कष्ट हर लेते हैं। मंदिरों में जलती अखंड ज्योत इस बात का प्रमाण है कि विश्वास का उजाला कभी कम नहीं होता।
3. चमत्कारों से भरा बचपन: उदय से झूलेलाल तक
चैत्र शुक्ल द्वितीया के दिन जिस बालक ने जन्म लिया, उसे 'उदय' पुकारा गया। लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, उनके ईश्वरीय चमत्कारों ने दुनिया को अचंभित कर दिया। पालने (झूले) में उनके दिव्य दर्शन होने के कारण भक्त उन्हें प्रेम से 'झूलेलाल' कहने लगे। आज वे हर सिंधी परिवार के इष्ट देव और रक्षक हैं।
4. आराधना का अनोखा स्वरूप: 'बाराणा साहिब'
चेटीचंड में जल की पूजा का विशेष महत्व है। श्रद्धालु आटे की लोई, मिश्री, सिंदूर और लौंग से 'बाराणा साहिब' तैयार करते हैं। मन्नत पूरी होने पर इसे जल में प्रवाहित करना केवल एक रस्म नहीं, बल्कि पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता भी है। यह जल के जीवों को भोजन कराने और प्रकृति का आभार जताने का एक सुंदर तरीका है।
5. परंपरा और आधुनिकता का संगम: कैसे मनाते हैं यह दिन
चेटीचंड के दिन पूरा समाज एक सूत्र में बंध जाता है। सुबह की शुरुआत बुजुर्गों के आशीर्वाद और 'टिकाणे' (मंदिरों) के दर्शन से होती है। महिलाएं आटे के दीप प्रज्वलित कर मंगल कामना करती हैं। शाम होते-होते अयोध्या के दीप पर्व जैसी छटा दिखाई देती है; हर घर पांच दीपकों और बिजली की लड़ियों से जगमगा उठता है। ढोल-ताशों की थाप पर निकलने वाली भव्य शोभायात्राएं इस उत्सव को 'सिंधी दीपावली' का रूप दे देती हैं।
नदियों के संरक्षण हेतु अब मुंडन जैसी रस्में मंदिरों में होने लगी हैं, जो समय के साथ समाज की जागरूकता को दर्शाती हैं। अंततः, चेटीचंड का यह उल्लास हमें लोक-कल्याण और खुशहाली के साथ नए साल की दहलीज पर ले जाता है।