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Written By WD Feature Desk
Last Updated : शनिवार, 6 सितम्बर 2025 (12:29 IST)

Anant Chaturdashi 2025: अनंत चतुर्दशी की कथा, मुहूर्त और पूजा विधि

Anant Chaturdashi
anant chaturdashi katha in hindi: आज 06 सितंबर 2025, दिन शनिवार को अनंत चतुर्दशी का पर्व मनाया जा रहा है। इस संबंध में पौराणिक शास्त्रों में जानकारी मिलती है कि पांडवों द्वारा जुए में अपना राजपाट हार जाने के बाद श्रीकृष्ण से पूछा था कि दोबारा राजपाट प्राप्त हो और इस कष्ट से छुटकारा मिले इसका उपाय बताएं। इस पर श्रीकृष्ण ने कहा था कि- तुम लोगों ने जुआ खेला था, जिसके दोष के चलते तुम्हें यह सब भुगतना पड़ा। इस दोष और कष्ट से छुटकारा पाने और पुन: राजपाट प्राप्त करने के लिए श्रीकृष्ण ने उन्हें सपरिवार सहित अनंत चतुर्दशी का व्रत करने की सलाह दी थी।ALSO READ: Ganesh Visarjan 2025: अनंत चतुर्दशी और गणेश उत्सव के अंतिम दिन का नैवेद्य और मंत्र, जानिए पूजा का शुभ मुहूर्त
 
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा था कि चातुर्मास के समयावधि में भगवान विष्णु शेषनाग की शैय्या पर अनंत शयन में रहते हैं। अनंत भगवान ने ही वामन अवतार में दो पग में ही तीनों लोकों को नाप लिया था। इनके ना तो आदि का पता है न अंत का इसलिए भी यह अनंत कहलाते हैं अत: इनके पूजन से आपके सभी कष्ट समाप्त हो जाएंगे। सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र के दिन भी इस व्रत के पश्चात फिरे थे।

आइए यहां जानते हैं अनंत चतुर्दशी के मुहूर्त, पूजा विधि और भगवान श्रीकृष्ण द्वारा सुनाई गई कथा-
 
अनंत चतुर्दशी 2025 के शुभ मुहूर्त : 
चतुर्दशी तिथि का प्रारंभ- 06 सितंबर 2025 को मध्यरात्रि 03:12 बजे से।
चतुर्दशी तिथि समाप्त- 07 सितम्बर 2025 को मध्यरात्रि 01:41 बजे तक।
अनंत चतुर्दशी का पर्व इस साल शनिवार, 6 सितंबर 2025 को मनाया जाएगा।
 
अभिजीत मुहूर्त- दिन में 11:54 से 12:44 तक।
अमृत काल- दोपहर 12:50 से 02:23 तक।
गोधूलि मुहूर्त - शाम को 06:37 से 07:00 तक। 
सायाह्न सन्ध्या: शाम 06:37 से रात्रि 07:45 तक।
 
अनंत चतुर्दशी पूजा विधि:
1. व्रत का संकल्प: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। 'ॐ अनंताय नमः' का जाप करते हुए व्रत का संकल्प लें।
 
2. कलश स्थापना: एक चौकी पर भगवान विष्णु और शेषनाग की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। एक कलश में जल, सुपारी, सिक्का और अक्षत डालकर रखें।
 
3. अनंत सूत्र की तैयारी: 14 गांठों वाला एक 'अनंत सूत्र' या कच्चे रेशम या कपास का धागा लें। इसे हल्दी और केसर से रंगकर तैयार करें। ये 14 गांठें 14 लोकों का प्रतीक मानी जाती हैं।
 
4. पूजा सामग्री: भगवान विष्णु को चंदन, अक्षत, फूल, धूप, दीप, और नैवेद्य (खीर, पूड़ी, मालपुआ) अर्पित करें। अनंत सूत्र को भी पूजा में रखें।
 
5. पूजा और मंत्र जाप: भगवान विष्णु की आरती करें और 'ॐ अनंताय नमः' मंत्र का 108 बार जाप करें। इसके बाद अनंत सूत्र की भी पूजा करें।
 
6. अनंत सूत्र धारण: पूजा समाप्त होने के बाद, पुरुष इस सूत्र को अपने दाहिने हाथ की कलाई पर और स्त्रियां बाएं हाथ पर बांधें।
 
7. कथा श्रवण: पूजा के बाद अनंत चतुर्दशी की व्रत कथा अवश्य सुनें या पढ़ें।
 
8. विसर्जन: इस दिन गणेश जी की मूर्तियों का भी विसर्जन किया जाता है। विसर्जन से पहले गणेश जी की विधिवत पूजा करें, मोदक और लड्डू का भोग लगाएं और अगले वर्ष जल्दी आने की कामना के साथ उन्हें विदा करें।
 
कथा : इस कहानी के अनुसार प्राचीन काल में सुमंत नाम का एक तपस्वी ऋषि रहता था और उसकी पत्नी का नाम दीक्षा था। दोनों की सुशीला नाम की एक सुशील पुत्री थी। सुशीला थोड़ी बड़ी हुई तो मां दीक्षा का स्वर्गवास हो गया। अब सुमंत ने बच्ची के लालन-पालन की चिंता के चलते दूसरा विवाह कर लिया। उसकी दूसरी पत्नी का नाम कर्कशा था। दूसरी पत्नी सचम में भी कर्कशा ही थी। पुत्री सुशीला जब बड़ी हुई तो उसका विवाह कौंडिन्य नाम के ऋषि से कर दिया। 
 
विदाई के समय सुशीला की सौतेली मां कर्कशा ने कुछ ईंट और पत्थर बांधकर दामाद कौंडिन्य को दिए। दामाद को कर्कशा का ये व्यवहार बहुत बुरा लगा। वे दु:खी होकर अपनी पत्नी के साथ चल दिए। रात में ऋषि कौंडिन्य एक नदी के किनारे रुककर संध्या वंदन करने लगे। इसी दौरान सुशीला ने देखा कि बहुत सारी महिलाएं किसी देवता की पूजा कर रही हैं। सुशीला ने उत्सुकता से उन महिलाओं से पूछा कि आप किस देव की पूजा कर रही हैं। 
 
महिलाओं ने कहा कि हम भगवान अनंत का पूजन कर रही हैं। उन महिलाओं ने सुशीला को इस पूजा और व्रत का महत्व भी बताया। यह सुनकर सुशीला ने भी उसी समय व्रत का अनुष्ठान किया और 14 गांठों वाला सूत्र बांधकर कौंडिन्य के पास आ गई। कौंडिन्य ऋषि ने सुशीला के बाजू पर बंधे अंनत सूत्र को जादू टोना समझकर उसे उतारकर फेंक दिया और वे वहां से अपने घर चले गए।
 
जिसके बाद से ही कौंडिन्य ऋषि के संकट के दिन शुरु हो गए। धीरे-धीरे उनकी सारी संपत्ति नष्ट हो गई और वे दरिद्र होकर दु:खी रहने लगे। इस दरिद्रता का कारण जब उन्होंने सुशीला से पूछा तो उन्होंने अन्नत भगवान का डोरा जलाने की बात कही और बताया कि अनंत भगवान तो भगवान विष्णु का ही रूप हैं। यह सुनकर ऋषि को घोर पश्च्याताप हुआ और वे अनंत डोर की प्राप्ति के लिए वन की ओर चल दिए। कई दिनों तक वन में ढूंढने के बाद भी जब उन्हें अनंत सूत्र नहीं मिला, तो वे निराश होकर भूमि पर गिर पड़े। 
 
उस ऋषि की यह दशा देखकर भगवान विष्णु प्रकट होकर बोले, 'हे कौंडिन्य', मैं तुम्हारे द्वार किए गए पश्च्याताप से प्रसन्न हूं। अब तुम घर जाकर अनंत व्रत को करो। 14 वर्षों तक व्रत करने पर धीरे-धीरे तुम्हारा दु:ख दूर हो जाएगा। तुम्हें धन-धान्य से पूर्ण हो जाओगे। कौंडिन्य ने वैसा ही किया और उन्हें सारे कलेशों से मुक्ति मिल गई। अत: इसी महत्व के कारण अनंत चतुर्दशी के दिन भगवान श्रीविष्णु के अनंत रूप का पूजन करके यह कथा पढ़ी अथवा सुनी जाती है। 

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