कविता : ईद पर गले मिलते हिन्दी-उर्दू







चन्द्रमा के पर,
के आमंत्रण पर।
तज़रीद के आवरण में,
ज़ुहाद के वातावरण में।

शोखियां पर्याप्त हों,
जब रोज़े समाप्त हों।

नेमतें हों, नाम हो,
प्रत्येक से सलाम हो।

परस्पर गलबहियां हों,
शीरो-शकर सिवइयां हों।

संज्ञान हो आबिदों का,
सम्मान हो ज़हिदों का।

मित्रगणों में दावत हो,
बंधु-बांधव सलामत हो।

ज़द्दो ज़िबह से इतर हो,
शुभकर हो।
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तज़रीद = श्रद्धा
ज़ुहाद = धर्म की बात
आबिद = श्रद्धालु
ज़हिद = पुजारी




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