त्रिनिदाद की दिवाली
- सुनंदा राव
दिवाली के दिन या उससे कुछ पहले लगभग प्रत्येक हिंदू परिवार पंडित को बुलाकर पूजा का आयोजन करता है। इन दिनों पंडित किसी वी.आई.पी. से कम नहीं होते हैं और उन्हें ढूँढ पाना कठिन होता है। दिवाली के दिन अधिकांश लोग पूरे दिन का उपवास रखते हैं।
मुझे मेरे विद्यार्थियों ने पहले वर्ष में बता दिया था कि गुरुजी नगर की दिवाली चाहे देखे न देखें पर 'फेलिसिटी' की दीपावली अवश्य देखें। पीआरए रोड पर स्थित लक्ष्मी के आवास पर हमारी कार पहुँची और पूरा परिवार स्वागत के लिए बाहर आ गया।
हमें एक छोटे से कमरे में बिठाया गया और भारतीय परंपरा के अनुकूल परंतु त्रिनिदाद की परंपरा के प्रतिकूल बिना माँगे पानी दिया गया। इसके पश्चात् नाश्ते के नाम पर पेट भरकर गुलाब जामुन, बरफी, खुरमा आदि परोस दिए गए।
यहाँ ये मिठाइयाँ इन्हीं नामों से जानी जाती हैं, भारतीय हों या अफ्रीकी सब जानते हैं कि बरफी, जलेबी या गुलाब जामुन क्या होता है। आम त्रिनिदादी मिठाई के बारे में पेटू नहीं है। हुजूर रसगुल्ला या गुलाब जामुन सुनकर मुँह में पानी मत लाइए क्योंकि इनके नाम पर जो खाने को मिलेगा वह न तो गुलाब जामुन होगा और न ही रसगुल्ला। आम त्रिनिदादी गुलाब जामुन को रसगुल्ला कहता है तथा गिल्ली के आकार में बालूशाही को गुलाब जामुन पर बरफी के नाम पर बरफी और जलेबी के नाम पर जलेबी ही मिलेगी।
हमारे मेजबानों का मन भारतीय परंपरा का पालन करते हुए खाने के माध्यम से अपना अपनत्व उड़ेलना चाहता था और यह अपनत्व ओढ़ा हुआ नहीं था इसलिए हमें इस विश्वास की रक्षा करनी ही थी। फिर भी नाश्ते पर अधिक समय न लगाते हुए हम बाहर आ गए। मैंने घड़ी में समय देखा, दिवाली की रात के आठ बजे थे और रात किसी नई दुल्हन-सी मुस्करा रही थी। यह समय का अजब चक्र है कि भारत में दिवाली गहमा-गहमी के बाद सुख की नींद ले चुकी थी और त्रिनिदाद में अभी अँगड़ाई ले रही थी क्योंकि दोनों देशों के समय में साढ़े आठ घंटे का अंतर है।
बाहर निकले तो चारों ओर सड़क पर सिर ही सिर दिखाई दे रहे थे। रेंगती हुई कारों से भ्रम हुआ जैसे मैं दिल्ली के सर्वाधिक व्यस्त बाजार करोल बाग में हूँ। जिधर भी निगाह जाती बाँस के द्वारा बनाईं गई विभिन्न आकृतियों पर दीये जगमगाते मिलते- कहीं ओम् के आकार के, कहीं स्वस्तिक के चिह्न के। एक-दूसरे से बतियाते, दिवाली की खुशियाँ बिखेरते, भारतीय परिधानों में सँवरे लोग।
चारों ओर दीयों की झिलमिल मुस्कराहट के बीच से निकलते हुए लग रहा था जैसे आकाशगंगा के छिटके सितारों के बीच मंद-मंद दूधिया प्रकाश में लिपटे हुए चले जा रहे हैं। लगभग हर घर संगीत की मधुर ध्वनियाँ बिखेर रहा था। कहीं से भजनों का अमृत बरस रहा था और कहीं से किसी हिंदी फिल्म का चर्चित गीत सड़क पर चलने वाली भीड़ के कदमों को थिरका रहा था। अनेक लोग घर के बाहर कुर्सियों पर बैठे आनंद उठा रहे थे। हर घर में दिवाली के दीये का प्रकाश बिखर रहा था और दिवाली जैसा ही पर आधुनिक गाँव सेंट हेलेना है जहाँ उसी उत्साह के साथ दीपावली मनाई जाती है।
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मुझे मेरे विद्यार्थियों ने पहले वर्ष में बता दिया था कि गुरुजी नगर की दिवाली चाहे देखे न देखें पर 'फेलिसिटी' की दीपावली अवश्य देखें। पीआरए रोड पर स्थित लक्ष्मी के आवास पर हमारी कार पहुँची और पूरा परिवार स्वागत के लिए बाहर आ गया।
हमें एक छोटे से कमरे में बिठाया गया और भारतीय परंपरा के अनुकूल परंतु त्रिनिदाद की परंपरा के प्रतिकूल बिना माँगे पानी दिया गया। इसके पश्चात् नाश्ते के नाम पर पेट भरकर गुलाब जामुन, बरफी, खुरमा आदि परोस दिए गए।
यहाँ ये मिठाइयाँ इन्हीं नामों से जानी जाती हैं, भारतीय हों या अफ्रीकी सब जानते हैं कि बरफी, जलेबी या गुलाब जामुन क्या होता है। आम त्रिनिदादी मिठाई के बारे में पेटू नहीं है। हुजूर रसगुल्ला या गुलाब जामुन सुनकर मुँह में पानी मत लाइए क्योंकि इनके नाम पर जो खाने को मिलेगा वह न तो गुलाब जामुन होगा और न ही रसगुल्ला। आम त्रिनिदादी गुलाब जामुन को रसगुल्ला कहता है तथा गिल्ली के आकार में बालूशाही को गुलाब जामुन पर बरफी के नाम पर बरफी और जलेबी के नाम पर जलेबी ही मिलेगी।
हमारे मेजबानों का मन भारतीय परंपरा का पालन करते हुए खाने के माध्यम से अपना अपनत्व उड़ेलना चाहता था और यह अपनत्व ओढ़ा हुआ नहीं था इसलिए हमें इस विश्वास की रक्षा करनी ही थी। फिर भी नाश्ते पर अधिक समय न लगाते हुए हम बाहर आ गए। मैंने घड़ी में समय देखा, दिवाली की रात के आठ बजे थे और रात किसी नई दुल्हन-सी मुस्करा रही थी। यह समय का अजब चक्र है कि भारत में दिवाली गहमा-गहमी के बाद सुख की नींद ले चुकी थी और त्रिनिदाद में अभी अँगड़ाई ले रही थी क्योंकि दोनों देशों के समय में साढ़े आठ घंटे का अंतर है।
बाहर निकले तो चारों ओर सड़क पर सिर ही सिर दिखाई दे रहे थे। रेंगती हुई कारों से भ्रम हुआ जैसे मैं दिल्ली के सर्वाधिक व्यस्त बाजार करोल बाग में हूँ। जिधर भी निगाह जाती बाँस के द्वारा बनाईं गई विभिन्न आकृतियों पर दीये जगमगाते मिलते- कहीं ओम् के आकार के, कहीं स्वस्तिक के चिह्न के। एक-दूसरे से बतियाते, दिवाली की खुशियाँ बिखेरते, भारतीय परिधानों में सँवरे लोग।
चारों ओर दीयों की झिलमिल मुस्कराहट के बीच से निकलते हुए लग रहा था जैसे आकाशगंगा के छिटके सितारों के बीच मंद-मंद दूधिया प्रकाश में लिपटे हुए चले जा रहे हैं। लगभग हर घर संगीत की मधुर ध्वनियाँ बिखेर रहा था। कहीं से भजनों का अमृत बरस रहा था और कहीं से किसी हिंदी फिल्म का चर्चित गीत सड़क पर चलने वाली भीड़ के कदमों को थिरका रहा था। अनेक लोग घर के बाहर कुर्सियों पर बैठे आनंद उठा रहे थे। हर घर में दिवाली के दीये का प्रकाश बिखर रहा था और दिवाली जैसा ही पर आधुनिक गाँव सेंट हेलेना है जहाँ उसी उत्साह के साथ दीपावली मनाई जाती है।

