Political Rhetoric India: भारतीय राजनीति के शब्दकोश में पिछले कुछ वर्षों में 'नीति' और 'विकास' जैसे शब्द हाशिए पर चले गए हैं। उनकी जगह ले ली है— 'गैंग', 'डकैत', 'जेहादी' और 'गद्दार' जैसे विशेषणों ने। जब सत्ता के गलियारों से 'गांधीनगर' को एक 'सिंडिकेट' और 'इटली' को 'डकैतों का अड्डा' बताया जाने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र का संवाद अब केवल 'गली युद्ध' (Street Brawl) तक सीमित रह गया है। लोकतंत्र में विपक्ष का होना अनिवार्य है, लेकिन विपक्ष को 'दुश्मन' समझना और सत्ता पक्ष को 'तानाशाह' कहना, दोनों ही अतिवाद हैं। गांधीजी के अहिंसा और सत्य के आदर्शों वाले देश में जब भाषा हिंसक हो जाती है, तो समाज की नैतिकता पर भी इसका गहरा असर पड़ता है।
"जब शब्द अपनी गरिमा खो देते हैं, तो विचार अपनी शक्ति खो देते हैं।"
गरिमा से गिरावट तक : भारतीय राजनीति का इतिहास गवाह है कि यहां वैचारिक मतभेद हमेशा रहे हैं, लेकिन संवाद की मर्यादा कभी नहीं लांघी जाती थी। अटल बिहारी वाजपेयी और पंडित नेहरू के दौर में पक्ष-विपक्ष एक-दूसरे का सम्मान करते थे। मगर आज का परिदृश्य देखकर मन में एक ही सवाल उठता है— क्या राजनीति केवल कीचड़ उछालने का खेल बनकर रह गई है? एक समय था जब संसद में अटल बिहारी वाजपेयी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को 'दुर्गा' कहा था। वैचारिक मतभेद होने के बावजूद सम्मान की एक महीन रेखा कभी नहीं लांघी गई। लेकिन 21वीं सदी की राजनीति ने उस रेखा को मिटा दिया है।
शब्दों का शस्त्रीकरण : संवाद नहीं, अब संहार है : राजनीति में शब्द अब संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि 'Weaponization of Words' का उदाहरण बन चुके हैं। जब एक पक्ष दूसरे को "डकैत ऑफ इटली" कहता है, तो निशाना केवल भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि उसकी राष्ट्रीयता और वंश (Pedigree) होता है। वहीं, जब "गैंग्स ऑफ गांधीनगर" जैसे शब्दों का प्रयोग होता है, तो उद्देश्य सामने वाले की लोकतांत्रिक वैधता को समाप्त कर उसे एक 'अपराधी' के तौर पर पेश करना होता है।
अटल-नेहरू युग : एक दौर वह था जब अटल बिहारी वाजपेयी ने वैचारिक विरोधी इंदिरा गांधी को 'दुर्गा' कहकर संबोधित किया था। गिरावट का दौर 2007 के आसपास तेज हुआ जब "मौत का सौदागर" जैसे जुमलों ने चुनावी विमर्श में प्रवेश किया। इसके बाद 'विदेशी बहू', '50 करोड़ की गर्लफ्रेंड', 'शहजादा' और 'नीच' जैसे शब्दों ने व्यक्तिगत चरित्र हनन (Character Assassination) को चुनावी टूल बना दिया।
सोशल मीडिया का युग : ट्विटर (X) और फेसबुक ने इस आग में घी डालने का काम किया। आज के दौर में राजनेताओं को पता है कि एक शालीन भाषण हेडलाइन नहीं बनेगा, लेकिन एक 'अपशब्द' उन्हें दिनभर ट्रेंड कराएगा। राजनीति की यह दूषित भाषा केवल टीवी कैमरों तक सीमित नहीं रहती, यह सीधे समाज के ड्राइंग रूम और सोशल मीडिया तक पहुँचती है। जब शीर्ष नेतृत्व ऐसी भाषा का उपयोग करता है, तो जमीनी कार्यकर्ता उसे 'युद्ध स्तर की मंजूरी' मान लेते हैं। परिणामस्वरुप, गली-मोहल्ले में भी नफरत का सामान्यीकरण (Normalization of Hate) हो गया है।
'गांधीनगर' और 'इटली' अब केवल भौगोलिक स्थान नहीं रहे, उन्हें राजनीतिक प्रतीकों (Political Symbols) में बदल दिया गया है। "यह पहचान की एक ऐसी राजनीति है जहाँ विकास के 'मॉडल' पर बहस करने के बजाय, व्यक्ति के 'मूल' (Origin) को अपराधी ठहराया जाता है। इसमें असली भारत, उसकी बेरोजगारी और महंगाई के मुद्दे शोर में दब जाते हैं। जब राजनीति का स्तर गिरता है, तो उसका सबसे बड़ा नुकसान 'संवाद' (Dialogue) को होता है। ADR जैसी संस्थाओं की रिपोर्ट्स बताती हैं कि राजनीति में गाली-गलौज और अपराधीकरण के कारण शिक्षित युवा इस क्षेत्र को 'कीचड़' मानकर इससे दूर हो रहे हैं।
भारतीय राजनीति को आज 'स्वछ्ता अभियान' की जरूरत है, लेकिन यह सफाई सड़कों की नहीं, बल्कि 'जुबान' और 'सोच' की होनी चाहिए। "गैंग्स" और "डकैत" जैसे शब्दों से सत्ता तो मिल सकती है, लेकिन एक स्वस्थ लोकतंत्र कभी नहीं बन सकता। यदि हम आज इन शब्दों पर मौन रहे, तो आने वाले समय में तर्क की जगह केवल शोर होगा और नीतियों की जगह केवल अपमान।