प्रभाकर के निधन से शोक की लहर

वार्ता|
हिन्दी के वयोवृद्ध गाँधीवादी साहित्यकार, अनेक कालजयी रचनाओं के रचयिता और साहित्य की अनेक विधाओं में अपनी कलम का जादू चलाने वाले साहित्यकार के निधन पर शोकाकुल साहित्य बिरादरी ने गहरा शोक प्रकट किया है। सभी ने एक स्वर में कहा कि चला गया 'आवारा मसीहा का रचनाकार'।


विष्णु प्रभाकर की वसीयत के अनुसार उनके पार्थिव शरीर को शनिवार दोपहर डेढ़ बजे दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान को दान के तौर पर सौंपा गया।

उनके निधन पर केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल, ज्ञानपीठ के कार्यकारी निदेशक एवं साहित्यकार रवीन्द्र कालिया, हंस के संपादक राजेन्द्र यादव, वरिष्ठ कवि कुँवर नारायण और आकाशवाणी में निदेशक लक्ष्मीशंकर बाजपेयी तथा कवि सुरेंद्र शर्मा समेत की कई हस्तियों ने गहरा शोक प्रकट किया है।
उनकी प्रसिद्ध रचनाओं में आवारा मसीहा, पंखहीन, जाने अनजाने, ढलती रात, स्वप्नमयी, नवप्रभात, डॉक्टर, संघर्ष के बाद, प्रकाश और परछाई तथा अशोक शामिल हैं।

उपन्यास अर्द्धनारीश्वर के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। ज्ञानपीठ के कार्यकारी निदेशक और साहित्यकार रवीन्द्र कालिया ने कहा कि प्रभाकर ने कई पीढ़ियों के साथ काम किया। उन्होंने नए लेखकों को प्रेरित, प्रभावित और लेखन कार्य के प्रति आस्थावान बनाया।
काफी हाउस संस्कृति को याद करते हुए कालिया ने बताया कि एक जमाना था, जब आँधी, तूफान और बारिश के बावजूद वे तुर्कमान गेट के अपने घर से कनाट प्लेस के रीगल वाले टी हाउस तक जरूर आते थे।

उनके बिना महफिल शुरू ही नहीं होती थी। मोहन राकेश, कमलेश्वर और निर्मल वर्मा जैसे तमाम सशक्त हस्ताक्षर उस महफिल की रौनक हुआ करते थे।
उन्होंने कहा कि विष्णुजी को उनकी कालजयी रचना आवारा मसीहा के लेखक के तौर पर सदा याद किया जाएगा। जिस प्रकार अनुसंधान कर उन्होंने शरत बाबू की जीवनी लिखी, वैसी बांग्ला में भी नहीं लिखी गई।

प्रभाकर के आवास पर शोक प्रकट करने पहुँचे केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने बताया उनके जाने से हिंदी साहित्य में एक शून्य पैदा हो गया है। वे गाँधीवादी विचारधारा के थे और आज की राजनीति की दशा को देखकर व्यथित थे।
हंस पत्रिका के संपादक राजेन्द्र यादव ने कहा कि विष्णुजी हवा, पानी और आसमान की तरह हमारे जीवन का अहम हिस्सा बन गए थे। ऐसे लोगों के न रहने पर उनके वजूद का अहसास होता है, जिसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता।

वरिष्ठ कवि कुँवर नारायण ने कहा कि विष्णुजी हिन्दी साहित्य के वरिष्ठतम साहित्यकार थे और उन्होंने लंबे समय तक साहित्य की सेवा की। उनके होने से साहित्यकारों को संबल मिलता था और अब उनकी कमी उनका साहित्य पूरी करेगा। उनका जाना साहित्य के लिए बड़ी क्षति है।
हिन्दी के सशक्त हस्ताक्षर और आकाशवाणी में निदेशक लक्ष्मीशंकर बाजपेयी ने कहा कि आवारा मसीहा, अर्द्धनारीश्वर और पंखहीन जैसी अमर कृतियों के सृजक विष्णु प्रभाकर का निधन हिन्दी साहित्य के लिए अपूरणीय क्षति है।

उन्होंने बताया कि आजादी के बाद रेडियो प्रसारण को समृद्ध करने में भी विष्णु प्रभाकर ने अहम भूमिका अदा की। नाट्य प्रभाग में रहते हुए उनके द्वारा लिखे गए रेडियो रूपक और एकांकी हमेशा आकाशवाणी की धरोहर रहेंगे।
उन्होंने कहा कि उनके साहित्य में आजादी के बाद मूल्यों के टूटने की कशमकश दिखाई देती है। जाने माने कवि सुरेंद्र शर्मा ने प्रभाकर को स्वर्गीय नहीं कहने की अपील करते हुए कहा वे कभी दिवंगत नहीं हो सकते। उनकी कृतियाँ हजारों साल तक जीवित रहेंगी।

उन्होंने कहा कि वे भी गालिब और खुसरो की तरह अमर हुए हैं। 'आवारा मसीहा' पर पीएचडी करने वाली और उनकी सहकर्मी अर्चना त्रिपाठी ने उनके आवास पर बताया कि प्रभाकर ने शरत बाबू की जीवनी आवारा मसीहा की रचना इतनी स्पष्टता के साथ की थी, जितना कि कोई बंगाली भी नहीं कर पाता।
उन्होंने बताया कि इस रचनाकार ने बांग्ला भाषा सीखी थी और रंगून के अलावा बंगाल के कई स्थानों का दौरा किया था। प्रख्यात आलोचक डॉ. नामवरसिंह, मैनेजर पांडेय, विश्वनाथ त्रिपाठी, नित्यानंद तिवारी, पंकज बिष्ट तथा दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. सुधीश पचौरी समेत अनेक साहित्यकारों ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की है।
प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष डॉ. नामवरसिंह ने अपने शोक संदेश में कहा है कि विष्णु प्रभाकर के निधन से साहित्य का एक युग समाप्त हो गया है। उन्होंने शरतचन्द्र की अनूठी जीवनी 'आवारा मसीहा' लिखी और ऐसी किताब तो बांग्ला में भी नहीं है। वे हर दिल अजीज सहित्यकार थे।

गाँधी टोपी, खादी का झोला और बंडी पहने वे अकसर टी हाउस आते थे और युवा लेखकों को स्नेह, सौहार्द और आशीर्वाद देते थे। उनके लिए वे प्रकाश स्तंभ और पितातुल्य साहित्यकार थे।



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