Nikita Tomar : तुम्हारी हत्या नहीं हुई आज मैं मर गई हूं, एक काल्पनिक चिट्ठी


मृतका निकिता की प्रत्यक्षदर्शी सखी की तरफ से एक काल्पनिक चिट्ठी


प्रिय निकिता,

तुम मार दी गई मेरे सामने, तुम छुपती रही मेरे पीछे और मैं कुछ न कर सकी। सखी थी मैं तुम्हारी, तुम्हारी राजदार, तुम्हारी हमराज, तुम्हारे साथ खिलखिलाने वाली, तुम्हारे साथ हर बात को साझा करने वाली.... आज तुम्हारी हत्या नहीं हुई आज मैं मर गई हूं... आज गोली तुम्हें नहीं मारी गई आज गोली मेरे कलेजे को चीर गई है। मैं निढाल हूं, मैं हैरान हूं, मैं हतप्रभ हूं... मेरी दोस्त, मेरी सखी, मेरी सहेली.. मेरी आंखों के सामने मार डाली गई और मैं कुछ न कर सकी... बस इस समय मेरी आंखों में खून उतर आया है, मेरे सामने जलते हुए सवाल नाच रहे हैं और मैं चीख भी नहीं पा रही हूं...

दिवाली आने वाली है, बुझ गई मेरे साथ की ज्योति, नहीं..बुझा दी गई मेरे अंधेरे दिल की रोशनी, एक
उजली किरण, एक उम्मीद...कहां से बात को आरंभ करूं, किसके साथ आरंभ करूं...?

टीवी पर आवाजें आ रही हैं : हरियाणा के वल्‍लभगढ़ में मूल रूप से हापुड़ की रहने वाली छात्रा (Nikita Tomar) की दिनदहाड़े हत्‍या हो गई।

तुम्हारे लिए तो सपने थे सबके कि किसी दिन अच्छे अंकों के कारण बनोगी टीवी की सुर्खियां पर आज तुम्हारा नाम सुनकर मैं टुकड़े-टुकड़े बिखर रही हूं.... हां मेरे सामने खत्म कर दी गई मेरी सखी, और मैं कुछ न कर सकी...

किसने की, क्यों की, कैसे की... इस पर मीडिया में पन्ने रंगे जा रहे हैं, टीवी पर बार बार चल रहा है वह वीडियो जिसमें तुम मेरे सामने कत्ल कर दी गई...मैं पूछना चाह रही हूं अपने ही समाज से क्या एक प्रतिभाशाली लड़की अपने साथ पढ़ने वालों के साथ भी सुरक्षित नहीं, सहज नहीं...

धर्म, प्रेम, दोस्ती, विश्वास, दया सब की पीठ पर एक साथ छूरा भोंक दिया गया, गोली मार दी गई
और मैं चीखती रह गई, देखती रह गई एक होनहार कन्या की हत्या... जिसने अपने जीवन में लगातार सफलता के उच्चतम अंक हासिल किए...लेकिन असफल हो गई भरोसे की परीक्षा में... साथ के मित्रों को पहचानने में...

एक बार पहले भी हो चुका था अपहरण तुम्हारा, फिर माफ कर दिया (राजनीति के दबाव में) और आगे बढ़ने की कोशिश करने लगी....

निकिता, मैं चीख भी नहीं पा रही हूं, कौन सुनेगा मेरी चित्कार...?

हम कहां जा रहे हैं, कोई रूक कर सवाल करेगा? हम कैसा समाज बना रहे हैं कोई ठहर कर सोचेगा?
यह कैसी जिद, कैसी मानवता है कि मेरा धर्म स्वीकार करो नहीं तो जान से हाथ धो बैठोगी? क्यों भला ? इतनी नीचता क्यों? इतना पतन क्यों? कहीं ऐसा तो नहीं कि धर्म बदलने से कातिल के बैंक अकाउंट में पैसा आता? हत्या के बदले भी तो कहीं कोई राशि तय नहीं थी...?

हां, सुना था मैंने भी अपने घर में बड़ों से... प्रेम, दोस्ती, साथ, संगत, विवाह इन सबमें धर्म, जाति, संप्रदाय देखना चाहिए...पर बड़ा सवाल यह है कि क्या कुछ लोग मन से इतने दरिद्र हो गए हैं कि संबंधों की गरिमा पर धार्मिक कट्टरता की काली छाया सवार होने दे रहे हैं और उसी के अनुसार जान लेने पर भी आमादा हो रहे हैं...

मेरी सखी तुम जहां हो वहां से देखना कि न्याय के लिए कितनी मोमबत्तियां जलती हैं तुम्हारे लिए, मानवाधिकार की कितनी तख्तियां सजती हैं सोशल मीडिया पर, कितनी फेमेनिस्ट सेलेब्रिटीज के आंसू उमड़ते हैं तुम्हारे लिए.....

तुम देखना कि सब कुछ सिलेक्टिव हो जाएगा, राजनीति की बिसात बिछ चुकी है, मीडिया के धड़े बंट चुके हैं, तुम धर्म के नाम पर मारी गई और तुम देखना कि धर्म के आधार पर ही तुम्हारे लिए आवाजों का बंटवारा होगा, तुम देखना सखी कि कितने लोगों की आवाजें इसी बात पर चली जाएगी कि तुम किसी धर्म विशेष की हो, किसी अन्य धर्म की होती तो शायद कोई गुंजाइश होती...

पर देखना धर्म के नाम पर तुम्हें मारकर फिर खेला जाएगा धर्म का ही गंदा खेल.... जबकि तुम स्त्री थी, तुम स्त्री हो, तुम स्त्री रहोगी, तुम्हारा कोई धर्म नहीं था... तुम्हें ना करने का अधिकार नहीं था...वैसे तुम्हें हां करने का भी अधिकार कहां था...? जब तक इस हां और ना के बीच मारी जाती रहेंगी लड़कियां... सुबकती रहेंगी बाकी बची हुई सहेलियां मेरी तरह....




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