Triple Talaq Bill : कानून के साथ समाज की सोच में बदलाव भी जरूरी


-शिवम् कर्मा (युवा पत्रकार)

मंगलवार को राज्यसभा में मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) बिल के बहुमत से पारित होते ही इसका कानून बनना लगभग तय हो चुका है। यह भारतवर्ष के सकारात्मक कानूनी रवैये को दर्शाता है। लोकसभा में 2 बार पारित होने के बावजूद विपक्ष के बहिष्कार के चलते यह बिल कानून बनते-बनते रह गया था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की दृढ़ इच्छाशक्ति के चलते यह विधेयक इस बार पारित हो ही गया आखिरकार।
इस कानून के बनते ही भारत भी महिला सशक्तीकरण की नई ऊंचाइयों को छुएगा। महिलाओं, खासकर मुस्लिम महिलाओं को तीन की इस कुप्रथा की वजह से काफी दंश झेलना पड़ता था। तीन तलाक एक आसानी से दिया जाने वाला तलाक बन चुका था जिसका दुरुपयोग कर कई मर्द बेवजह ही अपनी पत्नियों को तलाक देकर उनकी जिंदगी तबाह कर चुके थे। यह कुप्रथा महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली थी।
जाति व धर्म की चादर उठाकर इंसानियत की नजरों से एक-दूसरे को देखने का समय आ गया है। धर्म के ठेकेदारों ने आपस में बंटवारा कर कई ऐसी कुप्रथाएं लागू कीं, जो कि महिलाओं के सम्मान और गरिमा को ठेस पहुंचाती हैं। केंद्र सरकार के इस 'सबका साथ, सबका विकास' एजेंडे ने देश की सोच में जागरूकता लाई है।

पति-पत्नी के पवित्र रिश्ते को कैसे एक पल में तीन शब्दों से खत्म किया जा सकता है? अपने अहं के चलते पति तलाक दे देता है जिसका खामियाजा नाजुक मन की स्त्री को ही झेलना पड़ता है। उसकी पूरी जिंदगी बर्बाद हो जाती है। माना कि स्त्री सहनशील होती है लेकिन उसके ऊपर हो रहे शोषण के खिलाफ लड़ने का उसका पूरा अधिकार है।
इस कुप्रथा पर कानून बनने से इस दिशा में हो रहे अपराधों में निश्चित तौर पर कमी आएगी, लेकिन तीन तलाक जैसी सामाजिक कुप्रथाओं को जड़ से खत्म करने के लिए समाज को जाति व धर्म का चश्मा उतारकर इंसानियत की नजरों से देखना होगा जिससे ही भारतवर्ष सही मायनों में प्रगति की ओर अग्रसर होगा।

 

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