Triple Talaq Bill : अल्लाह की रज़ा सिर माथे, तीन तलाक़ अलविदा

आखिर वो बहुप्रतीक्षित फैसला आ ही गया। तीन अब गैर कानूनी, दंडनीय। सच जानिए,आज हर वो महिला दिल से खुश होगी, जो सिर्फ और सिर्फ नारी सशक्तिकरण की पैरोकार होगी और जिसे उनके धर्म से नहीं बल्कि उनकी बेहतरी से सरोकार होगा।

जानते हैं,मुस्लिम महिलाओं के लिए तीन तलाक के मायने क्या थे? ये उनके वैवाहिक जीवन पर एक सदा लटकी रहने वाली तलवार की भांति था। पति या ससुराल पक्ष की रीति-नीति के विपरीत जरा भी अपनी मति का उपयोग किया कि तलवार गिरी।

विवाह के पहले पिता की कठोर व रूढ़िवादी सरपरस्ती में और विवाहोपरांत ये तीन तलाक का भयानक साया।

तनिक सोचिए, कितना दम घुट जाता होगा। सहज जीवन की कहीं से कहीं तक कोई आस नहीं। जीवन तो ठीक, खुलकर सांस ले सकने पर भी पाबंदी।
धर्म वो है,जो आचरण को सुसंस्कारों की दीक्षा दे, जीवन को प्रगति की ओर उन्मुख कर सार्थकता से मंडित करे, मनुष्य को सही अर्थ में मानव बन सकने का मंत्र दे।

यह गंभीर रूप से विचारणीय है कि मुस्लिम महिलाएं ऐसी कड़ी वर्जनाओं के बीच कैसे अपने धर्म से ये सभी लाभ हासिल कर पाती होंगी? क्या उनका सम्पूर्ण जीवन पति व ससुराल पक्ष को साधकर रखने में ही नहीं बीत जाता रहा होगा?

जिन्होंने तनिक स्वतंत्रता मांगी होगी, जरा सा विद्रोह किया होगा,अपने हिस्से का पूरा नहीं, थोड़ा सा आकाश भी मांगा होगा उस पर या तो तीन तलाक़ की बिजली कहर बनकर टूटी होगी अथवा इसकी धमकी देकर उसे चुप करा दिया जाता रहा होगा।

उनके समाज से न होकर भी समानलिंगी और उससे भी ऊपर एक इंसान होने के नाते उनका ये सदियों पुराना दर्द मेरी आत्मा में भी टीसता रहा है।

आज संसद ने तीन तलाक़ को अमान्य कर वो ऐतिहासिक फैसला दिया है जिसके लिए मौजूदा सरकार का वर्तमान के साथ भावी पीढी भी अनंतकाल तक आभार व्यक्त करेंगी। सरकार के इस फैसले ने मुस्लिम महिलाओं के लिए फ़लक का द्वार खोल दिया है। अब उन्हें नहीं बल्कि उनके पति या ससुराल पक्ष को भयभीत रहने की आवश्यकता है क्योंकि तीन वर्ष का कारावास ,जुर्माना,आजीवन भरण पोषण का व्यय, पत्नी का पक्ष सुने बिना जमानत न मिल पाना आदि प्रावधान दिन में तारे दिखने या पांव के नीचे से जमीन खिसकने जैसी डरावनी और त्रासदायी अनुभूति कराने के लिए पर्याप्त है।

हमारी मुस्लिम बहनें अब खुलकर जीएं। तीन तलाक ने लगभग विदा ले ली है। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद यह कानून बन जाएगा। अब आपको डर डरकर जीने की आवश्यकता नहीं। जीवन साथी की जीवन में कितनी अहमियत है, वो अब अकेले एक पक्ष को नहीं बल्कि दूसरे पक्ष को भी समझ आएगी। तीन तलाक़ का जो धारदार हथियार सदा पत्नियों के दमन हेतु काम में लाया जाता रहा, उसकी धार अब भोथरी हो गई है।

मुस्लिम पुरुष यह भली-भांति जान लें कि अब उनकी बेहतरी सही मायनों में जीवनसाथी बनकर रहने में है न कि जीवन नियंत्रक बनने में। 'तीन तलाक़'
का वार अब उन पर भारी पड़ेगा। इसलिए पत्नियों को अपने कथित पौरुषीय अहंकार की लाठी से ना हांकते हुए उन्हें भी इंसान समझें,इंसान के नाते उनके अधिकार जानें और इस फैसले को इंसानियत के हक़ में मानें।

इस निर्णय का विरोध वही करेगा जो अनुदारवादी, रुढिप्रिय और प्रगति का शत्रु होगा। इसलिए बेहतर तो यही है कि आज न सिर्फ मुस्लिम महिलाएं खुश हों बल्कि सम्पूर्ण भारतवर्ष में जश्न मनाया जाए क्योंकि हमारा अपना ही एक दुर्बल हिस्सा आज सबल होकर जीवन को अपनी समग्रता में जीने के काबिल बना है। आज सरकार के साथ अल्लाह का भी शुक्रिया अदा कीजिये क्योंकि होता तो वही है जिसमे उसकी रज़ा होती है। अल्लाह की रज़ा सिर माथे ,तीन तलाक़ अलविदा।


 

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