जलगाँव। इस लोकसभा सीट के देश के लिए काफी मायने हैं। कारण देश की प्रथम महिला राष्ट्रपति यहीं से हैं।
जलगाँव में चुनाव से प्रचार का नूर गायब होने का एक ही कारण नहीं है। पहला और तात्कालिक कारण जो नजर आया वह चुनाव आयोग की आचार संहिता। इसकी 'धूप' ऐसी है कि कोई कुछ भी करने से घबरा रहा है। इस पर यहाँ प्रचार की गाड़ी की हवा मौसम निकाल देता है। दोपहर 11 बजे तक तो सूरज 46 डिग्री और दिन के दूसरे पहर यानी दोपहर दो बजे 47-48 डिग्री तापमान छूने लगता है। यहाँ एक रहस्यमय चुप्पी है जो बटन दबाने पर ही टूटेगी।
कहने को यहाँ 13 प्रत्याशियों के बीच में से एक का चुनाव होना है। फिर भी असली मुकाबला कमल छाप एटी पाटिल और घड़ी 'साज' वसंतराव मोरे के बीच है। रिक्शा वाले से लेकर व्यापारी तक को दुःख इस बात का है कि कुछ साल पहले भगवा ब्रिगेड (जीजा-साले) ने जो पत्ते फेंटे थे, वे सही नहीं थे।
यही बात राकांपा के पक्ष में जाती है, जबकि इस सीट को भगवा दुर्ग में माना जाता है। 6 विधानसभा सीटों में जलगाँव शहर, ग्रामीण, अमलनेर, एरंडोल, चालीसगाँव और पाचोरा है। 1951 से इमरजेंसी के बाद के चुनाव तक कांग्रेस का परचम रहा। इमरजेंसी के बाद भारतीय लोकदल। 1980 से कांग्रेस। 1991 और 1996 में भाजपा। 1998 में फिर कांग्रेस और इसके बाद भगवा परचम फहरा रहा है।