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चुनावी महाभारत में ''शिखंडी''

लोकसभा चुनाव
उत्तरखंड के स्थानीय चुनावों में देहरादून के मेयर पद के लिए बड़े-बड़े राजनीतिक महारथियों को छठी का दूध याद दिलाने वाली किन्नर रजनी रावत ने अब लोकसभा चुनाव में भी टिहरी संसदीय क्षेत्र से ताल ठोंक दी है। राजनीतिज्ञों को डर है कि इस चुनावी महाभारत में यह शिखंडी न जाने किन-किन भीष्म पितामहों को धराशायी कराएगी।

भारत के सबसे साक्षर शहरों में से एक देहरादून के लोगों द्वारा घिसे-पिटे नेताओं को दरकिनार कर नए चेहरों को दिल में बिठाने से उत्साहित उत्तराखंड की इस किन्नर ने लोकसभा पहुँचने के अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए एक बार फिर चुनावी मोर्चा संभाल लिया है। वह देहरादून के मेयर पद के चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी को पीछे छोड़ते हुए 40 हजार से अधिक मत लेकर दूसरे स्थान पर रही।

रजनी ने अपने चुनाव अभियान की शुरुआत गंगोत्री के शीतकालीन पूजास्थल मुखवा में अपनी नई पार्टी के गठन की घोषणा के साथ ही महीनों पहले कर दी है। उसका दावा है कि दल 2010 के विधानसभा चुनाव में राज्य के सभी 70 सीटों पर प्रत्याशी खड़े करेगा।

उत्तराखंड के किन्नर समाज की समस्त गद्दियों की प्रमुख रजनी की इस घोषणा से कांग्रेस का चिंतित होना तो स्वाभाविक है, लेकिन सत्ताधारी भाजपा भी उससे कम खौफजदा नहीं है। रजनी ने भाजपा के पूर्व राज्यमंत्री ज्ञानचंद और पूर्व विधायक मालचंद को अपने साथ मिला लिया है।

टिहरी के कांग्रेसियों की चिंता का कारण यह है कि अब मुस्लिम वोटों पर रजनी की नजर है। उसका कहना है कि उसका कोई मजहब और जाति नहीं है। उसका आगे पीछे कोई नहीं है इसलिए भ्रष्टाचार से धन कमाना तो रहा दूर उसका जो भी है, वह समाज का ही है। वह उत्तराखंड की खंडूरी सरकार को अब तक की सबसे भ्रष्ट और नाकारा सरकार मानती है।

रजनी का मानना है कि भुवनचंद खंडूरी के रहते उत्तराखंड में भाजपा की निकम्मी सरकार को हराना उसके बाएँ हाथ का खेल है। गढ़वाल के पौड़ी जिले में जन्मी रजनी पाँच साल की उम्र में माता-पिता को छोड़कर देहरादून आ गई थी। यहाँ आम किन्नरों की तरह बधाइयाँ माँगते हुए उसने गुजारा किया और बाद में दया नाम का एनजीओ शुरू किया।
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