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किताब के पास जाना

एक स्त्री के पास जाना है ....

रवींद्र व्यास
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क्या किताब के पास जाना एक स्त्री देह के पास जाने जैसा है। यह बहुत ही रोमांचक और उत्तेजित करने वाला अनुभव है। स्त्री की तरह ही किताबों में सदियों की करवटें सोई रहती हैं। एक आत्मीय स्पर्श पाकर वे करवटें अपनी तमाम बेचैनियों के साथ अपना चेहरा आपकी ओर करती हैं। लगभग पत्थर हो चुकी उसकी आँखें आपको एक नाउम्मीदी से टकटकी लगाए देख रही होती हैं।

स्त्रियों के पास जाते हुए वह विरल व्यक्ति होगा जो उसकी आत्मा पर पड़ी सदियों की खरोंचों पर धीरे धीरे अपनी अँगुलियाँ फेरता है और पाता है कि उसकी समूची देह वह प्रेमिल स्पर्श पाकर एक लय में काँप रही है।

उन खरोंचों में मवाद है। वहाँ सूख चुकी मृत चमड़ी की महिन परतें हैं। लेकिन उसके नीचे अब तक सदियों में मिले असंख्य घाव हैं। वे अब तक ताजा हैं, अपने हरेपन में छिपते हुए। जैसे वे सदियों पुराने नहीं, बस कल रात के ही हों। और अँगुली फिराते हुए कोई सूखी चमड़ी की परत उखड़ती है और वहाँ बिना किसी चीख या आह के घाव उघड़ जाते हैं और रक्त की सहसा उछल आई बूँद में बदल जाते हैं।

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बस यहीं और यहीं एक देह भी और इस तरह एक किताब भी यह महसूस करती है कि यही है वह स्पर्श जिसने मुझे ऐसे छुआ है कि इसके पहले कभी किसी ने नहीं छुआ था। और उसकी आत्मा के चंद्रमा से से सदियों से जो सफेद, महिन बुरादा झर रहा था वह अचानक एक दूधिया उजाले में अपनी पूरी पवित्रता के साथ झिलमिलाने लगता है।

एक देह इसी पवित्रता में अपनी कायांतरण इस तरह करती है कि सदियों से चट्टान के नीचे दबे बीज अंगड़ाई लेकर हरेपन के अनंत में अपनी नीली-पीली कोमलता में खुलते-खिलते हुए चमकने लगते हैं।

किताब के पास जाना एक स्त्री के पास जाना है। वह आपके स्पर्श करने के कौशल पर निर्भर करता है कि उसी देह को आप कैसे एक नई देह में बदलते हैं। यदि इस स्पर्श में यांत्रिकता और रोजमर्रा का उतावलापन है तो वही देह पाएँगे जो आपको लगभग निर्जीव-सा अनुभव देगी।

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किताब एक स्त्री की आत्मा का घर है

जिसमें देह का रोना सुनाई देता है

रोना एक स्वप्न है

जिसमें आत्मा की बहुत सारी हिचकियाँ रहती हैं

हिचकियाँ एक चादर है

जिसके रेशों में दुःख का रंग है

दुःख एक आईना है

आईने में दुनिया के अक्स हैं।

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किताब के पास जाना सचमुच एक स्त्री के पास जाना है। वहाँ अपने अकेलेपन में, अपनी ही धुरी पर घूमती पृथ्वी की आवाज एक आलाप की तरह सुनाई देती है। वहाँ अमावस्या और पूर्णिमा के बीच एक बेचैन चीख की आवाजाही है जिसका कोई ठोर नहीं। कोई ओर नहीं कोई छोर नहीं। वह अनंत में अंतहीन है।

जब आप किसी किताब को छूते हैं वह एक स्त्री को छूने जैसा ही है। आप उसे छूएँगे तो वहाँ आपको सारी उजाड़ का धूसर और भूरापन भी मिलेगा और बसंत नीला और पीलापन भी। वहाँ आपको बारिश की विलंबित लय भी मिलेगी और आलाप भी तो सूखे का चारों ओर गूँजता सन्नाटा भी। आपको रक्त को जमा देने वाली शीत ऋतु भी मिलेगी तो वहाँ आपको ग्रीष्म का वह ताप भी मिलेगा जो आपकी आत्मा में पैठ चुकी प्राचीन सीलन को सूखाकर उड़ा देगा।

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मैं जब भी किसी किताब को छूता हूँ तो लगता है एक स्त्री को छू रहा हूँ। एक स्त्री की तरह किताब भी अपने सारे रहस्य एक बार में नहीं खोलती। पूरे दुःख में, पूरे सुख में, सारी ऋतुओं में, उसे बार-बार छूकर और पढ़कर ही सही अर्थों में हासिल किया जा सकता है और तब वह अपने रहस्यों के अर्थ खोलती है।

एक देह में रुके समय को बहने के लिए और एक किताब में रुके समय को बहने के लिए एक प्रेमिल निगाह और प्रेमिल स्पर्श चाहिए होता है।
लेखक के बारे में
रवींद्र व्यास