किताब के पास जाना
एक स्त्री के पास जाना है ....
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स्त्रियों के पास जाते हुए वह विरल व्यक्ति होगा जो उसकी आत्मा पर पड़ी सदियों की खरोंचों पर धीरे धीरे अपनी अँगुलियाँ फेरता है और पाता है कि उसकी समूची देह वह प्रेमिल स्पर्श पाकर एक लय में काँप रही है।
उन खरोंचों में मवाद है। वहाँ सूख चुकी मृत चमड़ी की महिन परतें हैं। लेकिन उसके नीचे अब तक सदियों में मिले असंख्य घाव हैं। वे अब तक ताजा हैं, अपने हरेपन में छिपते हुए। जैसे वे सदियों पुराने नहीं, बस कल रात के ही हों। और अँगुली फिराते हुए कोई सूखी चमड़ी की परत उखड़ती है और वहाँ बिना किसी चीख या आह के घाव उघड़ जाते हैं और रक्त की सहसा उछल आई बूँद में बदल जाते हैं।
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एक देह इसी पवित्रता में अपनी कायांतरण इस तरह करती है कि सदियों से चट्टान के नीचे दबे बीज अंगड़ाई लेकर हरेपन के अनंत में अपनी नीली-पीली कोमलता में खुलते-खिलते हुए चमकने लगते हैं।
किताब के पास जाना एक स्त्री के पास जाना है। वह आपके स्पर्श करने के कौशल पर निर्भर करता है कि उसी देह को आप कैसे एक नई देह में बदलते हैं। यदि इस स्पर्श में यांत्रिकता और रोजमर्रा का उतावलापन है तो वही देह पाएँगे जो आपको लगभग निर्जीव-सा अनुभव देगी।
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जिसमें देह का रोना सुनाई देता है
रोना एक स्वप्न है
जिसमें आत्मा की बहुत सारी हिचकियाँ रहती हैं
हिचकियाँ एक चादर है
जिसके रेशों में दुःख का रंग है
दुःख एक आईना है
आईने में दुनिया के अक्स हैं।
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जब आप किसी किताब को छूते हैं वह एक स्त्री को छूने जैसा ही है। आप उसे छूएँगे तो वहाँ आपको सारी उजाड़ का धूसर और भूरापन भी मिलेगा और बसंत नीला और पीलापन भी। वहाँ आपको बारिश की विलंबित लय भी मिलेगी और आलाप भी तो सूखे का चारों ओर गूँजता सन्नाटा भी। आपको रक्त को जमा देने वाली शीत ऋतु भी मिलेगी तो वहाँ आपको ग्रीष्म का वह ताप भी मिलेगा जो आपकी आत्मा में पैठ चुकी प्राचीन सीलन को सूखाकर उड़ा देगा।
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एक देह में रुके समय को बहने के लिए और एक किताब में रुके समय को बहने के लिए एक प्रेमिल निगाह और प्रेमिल स्पर्श चाहिए होता है।

