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नन्हे शिशु पर बालगीत : भूख लगी...

poem on baby
पालने में लेटे एक नन्हे से भूखे शिशु पर एक बालगीत 
 
भूख-भूख लगी,
जोरों की भूख लगी।
 
रोई-चिल्लाई भी,
लोरी-सी गाई भी।
हाथों से पलने की,
गोटी खड़काई भी।
 
गुस्से में चाटी है,
मुट्ठी तक थूक लगी।
 
कहां गए चेहरे सब,
ओझल हैं मोहरे सब।
अम्मा के, दादी के,
कान कहां ठहरे सब?
 
सूरज चढ़ आया है,
खिड़की की धूप लगी।
 
कितनी चिल्लाऊं मैं,
किस पर झल्लाऊं मैं।
लगता है रो-रोकर, 
थककर सो जाऊं मैं।
 
मेरी सिसकी भी क्या, 
कोयल की कूक लगी?

 
लेखक के बारे में
प्रभुदयाल श्रीवास्तव
12, शिवम सुंदरम नगर, छिंदवाड़ा, मध्यप्रदेश (Mo.-+919131442512).... और पढ़ें