आइए जानते हैं कि आखिर क्यों और कैसे मनाई जाती है यह लंबी और कठिन हनुमान दीक्षा।
क्यों अलग है तेलुगु हनुमान जयंती?
ज्यादातर जगहों पर चैत्र पूर्णिमा को बजरंगबली का जन्मदिन मनाया जाता है, लेकिन तेलुगु परंपरा के अनुसार, असली उत्सव चैत्र पूर्णिमा से शुरू होकर ज्येष्ठ मास की दशमी तिथि तक चलता है। इसके पीछे दो प्रमुख मान्यताएं हैं:
मिलन का उत्सव: कहा जाता है कि दक्षिण के इन क्षेत्रों में यह दिन हनुमान जी के जन्म का नहीं, बल्कि उस खास दिन का प्रतीक है जब रामभक्त हनुमान की मुलाकात पहली बार भगवान श्री राम से हुई थी।
दीक्षा का समापन: भक्त चैत्र पूर्णिमा से 41 दिनों की 'हनुमान दीक्षा' शुरू करते हैं, जिसका समापन ज्येष्ठ दशमी को बड़े उत्सव के साथ होता है।
41 दिनों की कठिन 'हनुमान दीक्षा' के नियम
तेलुगु राज्यों में हनुमान जी की उपासना किसी कठिन तपस्या से कम नहीं है। भक्त इन नियमों का कड़ाई से पालन करते हैं:
नारंगी पहचान: श्रद्धालु विशेष 'हनुमान दीक्षा माला' धारण करते हैं और केसरिया या नारंगी रंग की धोती पहनते हैं।
नंगे पैर यात्रा: पूरे 41 दिनों तक भक्त बिना चप्पल-जूतों के नंगे पैर चलते हैं।
कठोर संयम: इस अवधि में मांस, मदिरा और धूम्रपान का पूरी तरह त्याग किया जाता है। सात्विक जीवन जीते हुए भक्त जमीन पर ही सोते हैं।
नित्य पूजा: प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करना और राम नाम का जप करना अनिवार्य होता है।
कैसे होती है पूजा?
हनुमान जयंती के दिन मंदिरों में ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से पहले) पूजा का सिलसिला शुरू हो जाता हैं। भक्त बजरंगबली की मूर्ति पर सिंदूर और चमेली का तेल अर्पित करते हैं। उन्हें गेंदे और गुलाब के फूलों से सजाया जाता है। भोग में लड्डू, हलवा और केले के साथ विशेष भीगी दाल चढ़ाई जाती है। बंदरों को भोजन कराना इस दिन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
भारत के अन्य राज्यों में स्थिति
कर्नाटक: यहां मार्गशीर्ष त्रयोदशी को 'हनुमान व्रतम' मनाया जाता है।
तमिलनाडु: यहां मार्गशीर्ष अमावस्या (दिसंबर-जनवरी) को हनुमथ जयंती मनाई जाती है।
संक्षेप में कहा जाए तो हनुमान पूजा के रूप अलग हो सकते हैं, तिथियां अलग हो सकती हैं, लेकिन हनुमान जी के प्रति अटूट विश्वास हर जगह एक समान है। दक्षिण भारत की यह 41 दिनों की परंपरा हमें सिखाती है कि भक्ति केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि जीवन जीने का एक अनुशासित तरीका है।
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