Bakrid story: इस्लामी कैलेंडर के मुताबिक बकरीद का त्योहार ज़िलहिज्जा महीने की 10वीं तारीख को मनाया जाता है। बकरीद (ईद-उल-अजहा) की यह कहानी आज से लगभग 4,000 साल पुरानी है। यह कहानी अल्लाह के एक महान पैगंबर (दूत) हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम और उनके बेटे हजरत इस्माइल के गहरे विश्वास, आज्ञाकारिता और अटूट निष्ठा पर आधारित है।
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1. अल्लाह की कठिन परीक्षा
2. पिता और बेटे का संवाद
3. शैतान की नाकाम कोशिश
4. आंखों पर पट्टी और छुरी का चलना
5. मोजिजा (चमत्कार) और भेड़ की कुर्बानी
6. कहानी से क्या सीख मिलती है?
आइए इस बेहद भावुक और प्रेरणादायक कहानी को सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं:
1. अल्लाह की कठिन परीक्षा
हजरत इब्राहिम बहुत बूढ़े हो चुके थे और उनके पास कोई संतान नहीं थी। उन्होंने अल्लाह से बहुत मिन्नतें कीं, जिसके बाद बुढ़ापे में उनके घर एक बेहद प्यारे बेटे का जन्म हुआ, जिसका नाम उन्होंने इस्माइल रखा। हजरत इब्राहिम अपने बेटे से बेइंतहा मोहब्बत करते थे।
जब इस्माइल थोड़े बड़े हुए (लगभग 10-13 वर्ष के), तब अल्लाह ने हजरत इब्राहिम के इम्तिहान (परीक्षा) का फैसला किया। हजरत इब्राहिम को लगातार तीन रातों तक ख्वाब (सपने) में दिखाई दिया कि अल्लाह उनसे कह रहे हैं- 'इब्राहिम, अपनी सबसे प्यारी चीज मेरे रास्ते में कुर्बान कर दो।'
2. पिता और बेटे का संवाद
हजरत इब्राहिम समझ गए कि अल्लाह उनसे उनके इकलौते और सबसे प्यारे बेटे इस्माइल की कुर्बानी मांग रहे हैं। अल्लाह का हुक्म उनके लिए सर्वोपरि था, लेकिन उन्होंने इस बारे में अपने बेटे से बात करने का फैसला किया।
जब हजरत इब्राहिम ने अपने बेटे से कहा: 'बेटा, मैंने ख्वाब में देखा है कि मैं तुम्हारी कुर्बानी दे रहा हूं, इस पर तुम्हारी क्या राय है?'
तो छोटे से इस्माइल ने बिना किसी डर या हिचकिचाहट के जवाब दिया:
'अब्बू जान! आपको जो हुक्म दिया गया है, आप वही कीजिए। इंशाअल्लाह (अगर अल्लाह ने चाहा) तो आप मुझे सब्र (धैर्य) रखने वालों में से पाएंगे।'
3. शैतान की नाकाम कोशिश
जब पिता और पुत्र दोनों अल्लाह के हुक्म को पूरा करने के लिए 'मीना' (मक्का के पास एक मैदान) की तरफ बढ़ रहे थे, तो रास्ते में शैतान ने उन्हें बहकाने की कोशिश की। शैतान ने हजरत इब्राहिम से कहा कि वह एक पिता होकर अपने ही बच्चे की जान कैसे ले सकते हैं। लेकिन हजरत इब्राहिम ने शैतान की बातों पर ध्यान नहीं दिया और उसे भगाने के लिए पत्थर मारकर दूर कर दिया।
(मान्यतानुसार आज भी हज यात्रा के दौरान इसी घटना की याद में 'जमरात' पर पत्थरों से शैतान को सांकेतिक रूप से मारा जाता है, जिसे 'रमी' कहते हैं।)
4. आंखों पर पट्टी और छुरी का चलना
कुर्बानी के स्थान पर पहुंचकर, हजरत इब्राहिम ने अपने बेटे को जमीन पर लिटा दिया। पिता का दिल कहीं बेटे की मासूमियत देखकर डगमगा न जाए और अल्लाह के हुक्म में कोई कमी न रह जाए, इसलिए हजरत इब्राहिम ने अपनी आंखों पर एक पट्टी बांध ली।
उन्होंने हाथ में तेज छुरी ली और पूरी ताकत से अपने प्यारे बेटे की गर्दन पर चला दी।
5. मोजिजा (चमत्कार) और भेड़ की कुर्बानी
जैसे ही हजरत इब्राहिम ने छुरी चलाई, अल्लाह ने उनकी सच्ची नियत, वफादारी और आत्मसमर्पण को स्वीकार कर लिया। अल्लाह के हुक्म से फरिश्ते (जिब्रईल) ने पलक झपकते ही हजरत इस्माइल को वहां से हटाकर सुरक्षित खड़ा कर दिया और छुरी के नीचे जन्नत से लाया गया एक दुंबा (नर भेड़/मेमना) रख दिया।
जब हजरत इब्राहिम ने अपनी आंखों से पट्टी हटाई, तो उन्होंने देखा कि उनका बेटा इस्माइल मुस्कुराता हुआ पास में खड़ा है और छुरी के नीचे एक भेड़ की कुर्बानी हो चुकी है। तभी आसमान से आवाज आई— 'ऐ इब्राहिम, तुमने अपने ख्वाब को सच कर दिखाया। हम नेकी करने वालों को ऐसा ही बदला देते हैं।'
6. कहानी से क्या सीख मिलती है?
यह कहानी सिर्फ एक जानवर की कुर्बानी देने के बारे में नहीं है। यह सिखाती है कि:
अहंकार और मोह का त्याग: इंसान को ईश्वर/अल्लाह की मर्जी के सामने अपने अहंकार, स्वार्थ और अत्यधिक मोह का त्याग करने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए।
साफ नियत: जानवर की कुर्बानी महज़ एक प्रतीक (Symbol) है। असली कुर्बानी अपनी बुराइयों, गलत आदतों और लालच को छोड़ना है।
यही वजह है कि इस महान ऐतिहासिक घटना की याद में दुनिया भर के मुसलमान हर साल बकरीद (ईद-उल-अजहा) मनाते हैं और बकरे, भेड़ या ऊंट की कुर्बानी देकर उसके मांस को गरीबों और जरूरतमंदों में बांटते हैं।
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