अगर शुरू हुआ अमेरिका-ईरान युद्ध तो 150 डॉलर के पार जा सकता है कच्चा तेल, भारत पर भी होगा असर
US Iran Conflict: निश्चित रूप से यदि अमेरिका और ईरान के बीच यह तनाव युद्ध में तब्दील होता है, तो इसका सबसे बड़ा और तत्काल प्रहार वैश्विक ऊर्जा बाजार पर होगा। खाड़ी देशों में युद्ध की आहट मात्र से कच्चे तेल की कीमतों में उबाल आने लगा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ईरान ने 'होर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) को बंद किया, तो दुनिया भर में पेट्रोल-डीजल की किल्लत और रिकॉर्ड तोड़ महंगाई का दौर शुरू हो सकता है। दुनिया की नजरें अब 33 किलोमीटर चौड़े समुद्री रास्ते 'होर्मुज जलडमरूमध्य' पर टिकी हैं, जिसे वैश्विक अर्थव्यवस्था की 'गले की नस' कहा जाता है।
दुनिया का 'एनर्जी गेटवे'
ईरान और ओमान के बीच स्थित होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण 'ऑइल चोकपॉइंट' है। दुनिया के कुल तेल व्यापार का लगभग 20 फीसदी और भारत की जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा इसी संकरे रास्ते से होकर गुजरता है। चिंता इसलिए भी है कि ईरान ने पहले भी कई बार चेतावनी दी है कि यदि उस पर हमला हुआ, तो वह इस रास्ते को ब्लॉक कर देगा। यदि ऐसा होता है, तो सऊदी अरब, इराक और यूएई जैसे बड़े उत्पादकों का तेल बाजार तक नहीं पहुंच पाएगा।
कीमतों पर क्या होगा असर?
विशेषज्ञों के अनुसार, युद्ध की स्थिति में तेल की कीमतें रातों-रात आसमान छू सकती हैं। युद्ध शुरू होते ही 'वॉर रिस्क प्रीमियम' के कारण ब्रेंट क्रूड 90 से 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकता है। यदि होर्मुज जलमार्ग पूरी तरह बंद होता है, तो कीमतें 120 से 150 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को भी पार कर सकती हैं। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यदि आपूर्ति लंबे समय तक बाधित रहती है तो यह 150 डॉलर के पार भी जा सकता है।
भारत पर भी होगा सीधा असर
भारत अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। खाड़ी में तनाव का मतलब है भारत में महंगा पेट्रोल और डीजल। माना जा रहा है कि क्रूड के 100 डॉलर के पार जाने की स्थिति में ईंधन की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच सकती हैं। इससे महंगाई बढ़ जाएगी। परिवहन लागत बढ़ने से फल, सब्जियां और रोजमर्रा की वस्तुओं के दाम बढ़ जाएंगे। तेल आयात बिल बढ़ने से भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले और कमजोर हो सकता है।
हालांकि बाजार में वर्तमान में तेल की अधिक आपूर्ति है, लेकिन खाड़ी देशों से आने वाले तेल का कोई ठोस विकल्प तुरंत उपलब्ध नहीं है। पाइपलाइनों के जरिए कुछ तेल निकाला जा सकता है, लेकिन वह कुल समुद्री व्यापार का बहुत छोटा हिस्सा है। विशेषज्ञों के अनुसार बाजार अभी 'देखो और प्रतीक्षा करो' की नीति पर है। अगर ट्रंप का 'अरमाडा' केवल दबाव बनाने के लिए है, तो कीमतें स्थिर रहेंगी। लेकिन अगर एक भी मिसाइल चली तो ऊर्जा बाजार में सुनामी आ जाएगी।
Edited by: Vrijendra Singh Jhala