Biography of Guru Ravidas: महान संत, कवि और समाज सुधारक गुरु रविदास जी (जिन्हें संत रैदास भी कहा जाता है) का जीवन सत्य, भक्ति और समानता का जीवंत संदेश है। साल 2026 में गुरु रविदास जयंती माघ पूर्णिमा के अवसर पर, 01 फरवरी, रविवार को मनाई जा रही है। वे पेशे से चर्मकार यानी मोची थे, लेकिन उनके विचार इतने उच्च थे कि आज भी उन्हें भक्ति आंदोलन का महान दार्शनिक माना जाता है।
ALSO READ: माघ पूर्णिमा के दिन करें 10 में से कोई एक दान, मिलेगा पितरों का आशीर्वाद
-
मीराबाई के आध्यात्मिक गुरु
-
'मन चंगा तो कठौती में गंगा' की उत्पत्ति
-
गुरु ग्रंथ साहिब में स्थान
-
मुगल बादशाह बाबर से मुलाकात
-
बचपन से ही दानवीर
-
जाति प्रथा पर कड़ा प्रहार
-
'बेगमपुरा' शहर की कल्पना
-
भक्ति और कर्म का मेल
-
चित्तौड़ के राजा-रानी का झुकना
-
सच्चा सूफी प्रभाव
आइए जानते हैं उनके जीवन से जुड़ी 10 ऐसी बातें जो शायद बहुत कम लोग जानते हैं
1. मीराबाई के आध्यात्मिक गुरु
बहुत कम लोग जानते हैं कि चित्तौड़ की प्रसिद्ध भक्तिन महारानी मीराबाई गुरु रविदास जी की शिष्या थीं। उन्होंने अपनी रचनाओं में स्पष्ट रूप से गुरु रविदास जी को अपना गुरु मानकर उनका आभार व्यक्त किया है।
2. 'मन चंगा तो कठौती में गंगा' की उत्पत्ति
यह कहावत रविदास जी के जीवन से जुड़ी है। एक बार एक ब्राह्मण ने उनसे गंगा स्नान चलने को कहा, तो उन्होंने जवाब दिया कि यदि मन शुद्ध (चंगा) है, तो इस कठौती (चमड़ा भिगोने के पात्र) के जल में ही गंगा का पुण्य है। मान्यता है कि उनकी श्रद्धा देखकर कठौती के जल से ही गंगा प्रकट हुई थीं।
3. गुरु ग्रंथ साहिब में स्थान
सिख धर्म के पवित्र ग्रंथ 'श्री गुरु ग्रंथ साहिब' में गुरु रविदास जी के 40 पद (शबद) शामिल किए गए हैं। इससे उनकी आध्यात्मिक महानता और स्वीकार्यता का पता चलता है।
4. मुगल बादशाह बाबर से मुलाकात
इतिहासकारों के अनुसार, जब बाबर ने भारत पर आक्रमण किया, तो वह गुरु रविदास जी की ख्याति सुनकर उनसे मिलने आया था। वह उनकी आध्यात्मिक शक्ति से इतना प्रभावित हुआ कि उसने उनके नाम पर दान-पुण्य भी किया था।
5. बचपन से ही दानवीर
रविदास जी का परिवार जूते बनाने का कार्य करता था। वे अक्सर नए जूते मुफ्त में संतों और जरूरतमंदों को दान कर देते थे। उनकी इस दानशीलता से उनके पिता कभी-कभी परेशान भी हो जाते थे।
6. जाति प्रथा पर कड़ा प्रहार
उन्होंने मध्यकाल के कट्टर माहौल में घोषणा की थी कि 'रैदास जन्म के कारनै, होत न कोऊ नीच' अर्थात् कोई भी व्यक्ति जन्म से नीच नहीं होता, बल्कि अपने कर्मों से महान बनता है।
7. 'बेगमपुरा' शहर की कल्पना
गुरु रविदास जी ने अपनी कविताओं में एक आदर्श शहर 'बेगमपुरा' (दुःख रहित नगर या बिना गम का शहर) की कल्पना की थी। यह एक ऐसा समाज था जहां कोई भेदभाव, गरीबी या दुख न हो। इसे दुनिया के शुरुआती 'यूटोपिया' (आदर्श समाज) विचारों में से एक माना जाता है।
8. भक्ति और कर्म का मेल
संत रविदास उन गिने-चुने संतों में से थे जिन्होंने अध्यात्म के लिए अपना काम (पेशा) नहीं छोड़ा। वे जूते सिलते-सिलते ही ईश्वर की भक्ति और सत्संग किया करते थे।
9. चित्तौड़ के राजा-रानी का झुकना
चित्तौड़ के महाराजा और महारानी झालीबाई उनकी आध्यात्मिक शक्ति के इतने कायल थे कि उन्होंने उन्हें राजमहल में आमंत्रित किया और उनके सामने नतमस्तक हुए, जो उस समय के सामाजिक ढांचे में एक बहुत बड़ी क्रांति थी।
10. सच्चा सूफी प्रभाव
रविदास जी की वाणी में न केवल हिंदू भक्ति भाव था, बल्कि उसमें सूफीवाद का भी गहरा प्रभाव झलकता था। यही कारण है कि उन्हें हर धर्म और वर्ग के लोग अपना मार्गदर्शक मानते थे।
'जन्म जात मत पूछिए, का जात अरु पात। रैदास पूत सभ प्रभु के, कोऊ नहिं विजात।'
अस्वीकरण (Disclaimer) : चिकित्सा, स्वास्थ्य संबंधी नुस्खे, योग, धर्म, ज्योतिष, इतिहास, पुराण आदि विषयों पर वेबदुनिया में प्रकाशित/प्रसारित वीडियो, आलेख एवं समाचार सिर्फ आपकी जानकारी के लिए हैं, जो विभिन्न सोर्स से लिए जाते हैं। इनसे संबंधित सत्यता की पुष्टि वेबदुनिया नहीं करता है। सेहत या ज्योतिष संबंधी किसी भी प्रयोग से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें। इस कंटेंट को जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है जिसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।
ALSO READ: गुरु हर राय जयंती, जानें महान सिख धर्मगुरु के बारे में 5 खास बातें