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short stories | धरती का कर्जदार

लघुकथा

कर्जदार मुन्ना मोहन यमराज लघुकथा लघुकथा
मुन्ना 'मोहन'
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मैंने कभी यह भी नहीं सोचा कि पक्षी, पेड़-पौधों और पशुओं के बिना 'जिंदगी बेकार है।' युवावस्था के समय मानवीयता को खूँटी पर टाँग कर, मैंने सिर्फ धन कमाने की ओर ही ध्यान दिया। अब जीना इतना मुश्किल हो गया है कि क्षीण तन आराम पसंद करता है और युवा मन को यह स्वीकार नहीं। मैं बिस्तर पर पड़े हुए दोनों के युद्ध को महाभारत के दृष्टा संजय की तरह देखता रहता हूँ।

आज भी दोनों का युद्ध देख रहा था कि मेरे सामने अचानक यमराज आकर खड़े हो गए, उन्हें देखकर मैं बोला - आप कौन...?

मेरी बात सुनकर वह मुस्कुराते हुए बोले - मैं यमराज हूँ और तुम्हें यहाँ से ले जाने के लिए आया हूँ।' यह सुनकर मेरे होश उड़ गए और घबराते हुए बोला - प्रभु लेने आए हैं, तनिक रुकिए...।'

मेरी बात सुनकर वह तत्काल ही बोले - मेरे पास तुम्हारी बात सुनने का समय नहीं है क्योंकि मैं नियम की जंजीरों की से जकड़ा हुआ हूँ।'

यमराज की बात सुनकर मैं कातरभाव से बोल पड़ा- 'स्वामी, आप सत्य कह रहे हैं परंतु मैं फिर भी कुछ निवेदन करना चाहता हूँ।'

यह सुनकर वह बोले - कहो, तुम्हें क्या कहना है..?' उनके इतना कहते ही मैं आनंद विभोर हो गया और बोला - भगवन, मैं चलने को तैयार हूँ... परंतु मेरे चलने के बाद इस शरीर की दुर्गति होगी।'

मेरे इतना कहते ही यमराज खिलखिलाकर हँसते हुए बोले - 'अरे मूर्ख इतना भी नहीं जानता कि शरीर से आत्मा का गमन हो जाने के बाद अग्निदेव इसे अपने आगोश में लेकर भस्म कर देते हैं।'

धर्मराज की बात सुनकर मैंने निवेदन किया - स्वामी यह बात तो मुझे परेशान कर रही है क्योंकि बिना लकड़ी का सहारा लिए आग भी इस तन को भस्म नहीं कर पाएगी। मैंने तो आज तक एक पेड़ भी नहीं लगाया है और शरीर को जलाने के लिए चार-पाँच क्विंटल लकड़ी तो चाहिए ही।

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यह सुनकर यमराज असमंजस में पड़ गए और बोले - 'आखिर तुम कहना क्या चाहते हो, मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा है। अरे भाई स्पष्ट रूप से कहो न..?

'प्रभु.. जिस प्रकार लकड़ियों के अभाव में मेरे तन की दुर्गति होगी उसी प्रकार से आत्मा की दुर्गति नरक में होगी क्योंकि मैंने सिर्फ पाप ही पाप किए हैं। इसलिए अब चार-पाँच साल का वक्त और दे दो जिससे कुछ पेड़-पौधे लगाकर इस धरती मैया का ऋण तो अदा हो जाए अन्यथा हमेशा कर्जदार बना रहूँगा।'