स्‍त्री पैदा नहीं होती, बना दी जाती है

Simon
WDWD
- सिमोन द बोवुआ
दुनिया की पहली नारीवादी चिंतक और विचारक, जिन्‍होंने स्त्रियों की समस्‍या को पहली बार इतिहास, विज्ञान और दर्शन के साथ समायोजित कर आर्थिक-सामाजिक संदर्भों में उसकी व्‍याख्‍या की। जिन्‍होंने अपने विचारों के अनुसार जीवन जीने का साहस भी दिखाया। सिमोन द बोवुआर की पुस्‍तक ‘द सेकेंड सेक्‍’ आज भी विश्‍व भर की करोड़ों महिलाओं के लिए प्रकाश-स्‍तंभ की तरह है। 70 के दशक में एक जर्मन पत्रकार एलिस श्‍वाइत्‍जर ने सिमोन के कई लंबे-लंबे इंटरव्‍यू लिए, जो स्त्रियों की तत्‍कालीन दशा को संबोधित थे। हम उन साक्षात्‍कारों के कुछ चुनिंदा अंश समय-समय पर प्रकाशित करते रहेंगे। यहाँ प्रस्‍तुत है, ‘द सकेंड सेक्‍’ के प्रकाशन के तीस वर्ष पूरे होने पर लिए गए एक इंटरव्‍यू के कुछ अंश:

एलिस श्‍वाइत्‍जर : उस घटना को पाँच साल हो चुके हैं, जब आपने पहली बार अपने नारीवादी होने की घोषणा की। आप आधुनिक नारीवाद के लिए महान प्रेरणा-स्रोत थीं। लेकिन आप खुद आधुनिक स्त्री-आंदोलनों की शुरुआत से पहले स्वयं नारीवाद-विरोधी थीं। नारीवाद-विरोधी इस अर्थ में कि आपने स्वायत्त स्त्री-आंदोलन का विरोध किया और आपका विश्वास था कि समाजवादी क्रांति से स्त्री उत्पीड़न की समस्या स्वत: हल हो जाएगी। तब से लेकर आज तक काफी कुछ घटित हो चुका है। आप स्वयं महिला-आंदोलन में सक्रिय हैं, और औरतों के संघर्ष के प्रति जन-साधारण में जागरूकता पैदा हुई है। तथाकथित अंतरराष्ट्रीय महिला वर्ष ऐसे में किसी रोग का सूचक लगता है। आप इस बारे में क्या सौचती है?

WD|
सिमोन द बोवुआर : हम नारीवादी इस संबंध में कई बार अपने विचार व्यक्त कर चुके हैं। हम औरतों को मूर्ख बनाया गया है और अपमानित किया गया है। अगली बार अंतरराष्ट्रीय समुद्र वर्ष मनाया जाएगा, फिर अंतरराष्ट्रीय घोड़ा वर्ष, फिर कुत्ता वर्ष और फिर इसी तरह और भी.... पुरुष औरतों को वस्तु समझते हैं, जिनका कोई मूल्य नहीं है और जिन्हें मर्दों की इस दुनिया में बहुत गंभीरता से लेने और एक ‘वर्’ व ‘समारो’ से ज्यादा तूल देने की कोई जरूरत नहीं है। और तब, जबकि हम पूरी मानव-जाति का आधा हिस्सा हैं। अंतरराष्ट्रीय महिला वर्ष मनाया जाना बहुत ही विकृत और भौंडा है। सभी वर्षों को अंतरराष्ट्रीय महिला वर्ष होना चाहिए, बल्कि यह कहा जाए कि अंतरराष्ट्रीय मानव वर्ष।



और भी पढ़ें :