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तुम जो मेरे हुए :प्रेम कविता

मंगलवार,अप्रैल 6, 2021
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अप्रैल फूल कहीं नहीं खिलता मगर खिल जाता एक अप्रैल को क्या, क्यों, कैसे ? अफवाओं की खाद से और
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बहुत जुगत लिया लगाय, पर सूझे न कोई उपाय, तीव्रमती पड़ोसन को कैसे बनाया मूरख जाय, सहसा बुद्धि में द्रुत गति से
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हर एक ग़म को हर्फ़ में ढाला था किसे कहां पता भीतर हाला था लब की शोख हंसी चेहरे का नूर ख़ुद को तपा कर उसने ढाला था
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होली का रंगबिरंगा पर्व आ गया है लेकिन कोरोना की कालिमा ने सारे रंगों को जैसे ग्रहण लगा दिया है। कोरोना के साये में मनाई जाने वाली होली की शुभकामनाएं भी बदली बदली हैं आइए ... इस बार इन शुभकामना संदेशों से करें होली की शुरुआत...
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होली का त्योहार मस्ती और ठिठोली का होता है लेकिन इस बार होली पर हमें सुरक्षा के नियमों का पालन करना है और एहतियात से त्योहार की खुशियां मनानी है... इस बार अपनों को संदेश भेजें लेकिन कोरोना की सुरक्षा चेतावनी के साथ.. वेबदुनिया की टीम आपके लिए लाई है ...
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रंगों का सजीला पर्व होली करीब है.. लेकिन कोरोना के कारण उदास गुलाल और अबीर है.... कोरोना किसी का सगा नहीं, सामने कौन है गरीब या अमीर है.... समझना और समझाना हमें ही है, शुभकामनाओं के जरिए संदेश यह फैलाना है, अपने साथ अपनों को भी बचाना है....
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सौरभ फैला विपुल धूप बन, मृदुल मोम-सा घुल रे मृदु तन; दे प्रकाश का सिन्धु अपरिमित, तेरे जीवन का अणु गल-गल!
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जीते जी क्रांति करने वाले भगत सिंह के लिखे हुए शेर उनके बाद भी क्रांति पैदा करने की ताकत रखते हैं। देश के प्रति उनका प्रेम, दीवानगी और मर मिटने का भाव, उनकी शेर और कविताओं में साफ नजर आता है, एक बार पढ़ेंगे तो खून में देशभक्‍ति महसूस होने लगेगी।
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देश के प्रति उनका प्रेम, दीवानगी और मर मिटने का भाव, उनके शेर-ओ-शायरी और कविताओं में साफ दिखाई देता है, जो आज भी युवाओं में आज भी जोश भरने का काम करता है। पढ़ें भगत सिंह के वतन पर लिखे यह 7 शेर -
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मीरा के मनभावन माधव, रूक्मा राज किए संग कान्हा, होली रंग रंगा बरसाना, पग-पग राधा पग-पग कान्हा। नीला,पीला, हरा, गुलाबी, सतरंगी अंबर होली का, आओ मिलकर खुशियां बांटें, कष्टों की जल जाए होलिका।
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हवाओं की सरसराहटों में कैसी अबूझ तान, पतझड़ी पत्तों की खड़क में बज रही मृदंग। प्रेमियों के विकल मन में दस्तकों से मदनोत्सव की,
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चुनियां को मुनियां ने पकड़ा नीला रंग गालों पर चुपड़ा इतना रगड़ा जोर-जोर से, फूल गए हैं दोनों गाल।
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आओ लिख दूँ अधर की स्याही से तुम्हारी देह रूपी काग़ज़ पर मूक कविताएँ जिनके महकते लफ़्ज़ तुम्हारी सुंदरता को द्विगुणित कर देंगे
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हो सबसे बेहतर मिरे लिए ,तिरा कोई सानी नहीं है । सुन मिरे अमीर !तिरे ज़ज्बातों का तर्जुमानी नहीं है ! चाहे हो बहार-ए-फ़िज़ा या फिर ख़ुश्क खिज़ां का झड़ता मौसम , ऐसे ख़ुशपाश रक्खे मुझे, तिरे जैसा कोई दिलवर-ए-जानी नहीं है !
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अगर कविताएं न होतीं तो शायद बहुत सी प्रेम कहानियां भी गर्भ में दम तोड़ देतीं। मानवीय चेतना प्यासी रह जाती और मूकभावों का वैश्विक युद्ध छिड़ जाता। कितने रिश्ते, कितना बोझ अपने अंदर समेटे अविरल धारा सी बहती हैं कविताएं!
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जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की। और दफ़ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की।
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बिन पानी खिल जाते टेसू फागुन में, पानी संग मिल रंग लाते टेसू फागुन में, रंगों के खेल हो जाते शुरू फागुन में दुश्मनी छोड़ दोस्ती के मेल होते फागुन में
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Corona Time : कोरोना का एक साल

बुधवार,मार्च 10, 2021
सुन लो सुनाती हूं कहानी कोरोना काल की, जोड़ी इसने बना दी सैनिटाइजर मास्क की। कोविड-19 देश में पहुंचा पुणे में प्रथम, पैर फैलाए विश्व में लगा आ गया कोरोना का भूकम्प।
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हे पार्वती पति ! अविनाशी व्योमकेश मैं न जानती तेरा पूजन विशेष योग भी ना समझूं ना आती अर्चना, बस तू ही अंतस में तू ही मानस में तू ही अंतरंग में तू ही बहिरंग में और मैं रहती तेरी आवृत्तियों में सदा से गुम और ...
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