poem | सच्ची पापा, नयन तरसते हैं
-सहबा जाफरी
सैलानी बादल शहर में ज्यादा देर न सजते हैं
पापा मौसम गाँवों वाले, कहाँ पे बसते हैं।
बारिश भी बारिश के जैसी कम-कम लगती है
ना कागज की नाव बनाकर बच्चे गाते हँसते हैं।
न शहरों के कमरों में हवा सुहानी आती है
ना ही रात को आँखों में चाँद सितारे सजते हैं।
गुड़-धानी मूँगफलियाँ मेरी, यहाँ कहाँ कोई खाता है
बैक समोसे खाकर सारे ऊपरी मन से हँसते हैं।
दिल दुखने पर माँ का आँचल हमें नहीं मिल पाता है
धूल धुएँ की तलछट में ही ख़्वाब सिसकते हैं।
अपनी छत से गुलमोहरों का भीगा मंजर देखने को
सच्ची पापा कभी-कभी तो नयन तरसते हैं।
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पापा मौसम गाँवों वाले, कहाँ पे बसते हैं।
बारिश भी बारिश के जैसी कम-कम लगती है
ना कागज की नाव बनाकर बच्चे गाते हँसते हैं।
न शहरों के कमरों में हवा सुहानी आती है
ना ही रात को आँखों में चाँद सितारे सजते हैं।
गुड़-धानी मूँगफलियाँ मेरी, यहाँ कहाँ कोई खाता है
बैक समोसे खाकर सारे ऊपरी मन से हँसते हैं।
दिल दुखने पर माँ का आँचल हमें नहीं मिल पाता है
धूल धुएँ की तलछट में ही ख़्वाब सिसकते हैं।
अपनी छत से गुलमोहरों का भीगा मंजर देखने को
सच्ची पापा कभी-कभी तो नयन तरसते हैं।
