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शब्द शायद बदलेंगे

गंगाप्रसाद विमल

शब्द
ND
शब्द शायद बदलेंगे
ऐसे ही नहीं रहेंगे।

सदियों पुरानी
भाषा देखो
वह लिखते लिखते
थिर नहीं रही
उसे बदलना पड़ा

आकृतियाँ
मिट-मिट कर
चाहे फिर से बनती हों
वे बदलती हैं
चाहे जिस कारण।

शायद
हाँ शायद
अर्थ न बदलेंगे।
क्या गुस्सैल आँखों में
हिंसा के भाव
चुक सकते हैं?

हत्या की चाह
और वासना
बलात् अपने
सनातन रूप में
अपनी ही अर्थमय गति में
सार्थक होती हैं

यहीं आप पकड़ सकते हैं
क्योंकि आपकी सदी तक
आते-आते
सार्थक का अर्थ
नैतिक और रचनात्मक
छाप छोड़ता है।

बलात्कारी के शब्दों की ऊर्जा
जब पूर्णता को जाती है
अगली सदी में उसे
सार्थकता ही कहेंगे

क्योंकि जब
मौन का
शुचिता से
शायद संबंध न रहेगा।

शब्द अगर पत्ते हैं
तो अर्थ जड़ें नहीं हैं
संपूर्ण नित्यमयता से
जोड़ कर देखने पर ही
शायद सब कुछ बदलेगा
अतीत जैसा भविष्य भी।