मां, गीत का मुखड़ा
-नरेन्द्र जोशी
लीप रही घर उखड़ा मां किसे सुनाए दुखड़ा मां। धान कूटकर ऊखल मेंढूंढ रही है सुपड़ा मां। बच्चों को भरपेट खिलाखा लेती एक टुकड़ा मां। तीन बरस से एक वहीपहन रही है लुगड़ा मां। चोट तुम्हें पहुंचाकर केजो फैला वह सिकुड़ा मां। जिस घर तेरा मान नहींशनैः-शनैः वह उजड़ा मां।मां कहते ही मेरा मनबादल जैसा उमड़ा मां । घर को गीत कहेंगे तोहोगा गीत का मुखड़ा मां।