मखमली निस्तब्ध अँधेरा
दीप्ति गुप्ता
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एक उपेक्षित
तिरस्कृत, आलोचित पक्ष
लेकिन, क्या..
अँधेरे की गहनता को
शीतलता को,
अपूर्व प्रभाव को
अनूठी शान्ति को
तुमने कभी परचा है,
परखा है ?
जब वह बिखेरता है
मखमली, निस्तब्ध
इन्द्रजाल सी खामोशी
तो चीखती - चिल्लाती दुनिया
एकाएक सो जाती है,
तनाव मुक्त हो जाती है!
अस्वस्थ - स्वस्थ,
अमीर - गरीब,
राजा - रंक सभी को
बिना भेद भाव के
निद्रा की चादर ओढ़ा
शान्त बना देता है,
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कैसा मानवतावादी,
कैसा समाजवादी,
यह अँधेरा............!
भ्रष्टाचार, प्रदूषण, अशान्ति
सब ठहर जाते हैं,
कितना प्रभावशाली,
कितना शक्तिशाली,
किन्तु निरा अस्थायी ........!!
साभार : स्वर्ग विभा

