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Written By रवींद्र व्यास

बाकी सब जा चुके हैं...

साहित्य
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यह एक माँ का विलाप है,

जो मारे गए बेटे की मृत देह को छूकर

सुदूर लहराते नीले-काले समुद्र की

लहरों में डूब गया है।

जहाँ यह विलाप लहरों में डूबता है,

वहाँ एक सफेद पंछी

अपने पंख फड़फड़ाते हुए

रुका हुआ है।

बाकी सब जा चुके हैं।

इन पंखों की फड़फड़ाहट की आवाज

लहरों-सी उठती हुई

विलाप को वहाँ से थाम लेती है,

जहाँ उस माँ की साँस टूटती-सी लगती है।

बाकी सब जा चुके हैं।

यह धूप में चमकता हुआ

अधजला एक टूटा पंख है,

जो जाने कहाँ से टूटकर

यहाँ तक चला है,

जहाँ एक माँ अपने बेटे के लिए

गोल-गोल रोटियाँ सेंक रही है।

बाकी सब जा चुके हैं।

दूर कुछ लपटें हैं,

धुआँ है,

चटकती लकड़ियाँ है

और एक पिता

मारे गए पुत्र की हडिड्याँ

एक लोटे में लिए बैठा है।

बाकी सब जा चुके हैं।

एक कमरा है,

झरती हुई अगरबत्ती है,

थोड़ी-थोड़ी देर में उठती एक रुलाई है।

बाकी सब जा चुके हैं।

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इधर-उधर खेलते कुछ बच्चे हैं,

सफेद साड़ियाँ हैं,

और दीवार से टिके सिर हैं

बाकी सब जा चुके हैं...
लेखक के बारे में
रवींद्र व्यास