फिर एक नया वर्ष
ज्योति जैन
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लगता है कल की ही बात है
शिक्षक दिवस पर गली की बच्चियों ने
फूल माँगे, पर बाबा ने नहीं दिए ,
आज भी इस बात की कसक
मन में रह गई है।
विजया दशमी पर हर मोहल्ले में
कई रावण फूँके जा रहे थे,
बावजूद इसके कि हर जगह
कुछ जीते जागते रावण
विचरण कर रहे हैं,
बरसों से गड़ी है
ये फाँस मन में।
फिर आया दीपोत्सव!
आह, कितने उल्लास का पर्व
लगता है गम का कहीं
नामोनिशान ही नहीं!
दीपावली की रात हमारे बच्चे
न जाने कितने रुपयों में लगा आग
उल्लासित हुए ,
साथ में हम भी,
खुशी से थक कर चूर हो सो गए
बेफिक्री की नींद।
रात को छोड़े गए पटाखों के कचरे से
कचरा बीनने वाले बच्चे,
खुब-खुश होकर जब बचे-खुचे पटाखे बीनते हैं
तब दुत्कार कर भगा दिए जाते हैं,
गृहस्वामी द्वारा।
लगता है कल के पटाखे बेसुरे हो
एक टीस मन को दे गए हैं
कुछ छालों के रूप में।
देखते ही देखते वर्ष बीत गया,
पता ही नहीं चला,
लगता है जिन्दगी बड़ी खुशहाल है,
तब ही तो वक्त जल्दी निकल गया।
और उत्सव का एक और मौका आ गया।
वही, अपना 'थर्टी फर्स्ट दिसंबर'
ढेरों पार्टियाँ होंगी
और मनेगी खुशियाँ, मदिरा द्वारा।
अगर कुछ गम हुए तो वह भी,
मदिरा में ही डुबोएँगे ना
भूल जाएँगे हम मुंबई के शहीदों को
आतंकवाद के दरिंदों को,
कोई कड़कड़ाती सर्दी में, अभावों में
मर-मरकर जीता है तो जिए
हमारी बला से!
हम तो नए साल का जश्न मना लें।
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अभी पूरी तरह पीछा नहीं छूटा,
और ये मुआ वर्ष एक खत्म हो
दूसरा चला आया।
बिना किसी बदलाव के,
वही पुराना सिलसिला जारी रखने,
सतत् ... निरन्तर ...!
