पुराना खत
- जनार्दन मिश्र
तुम्हारे किसी पुराने खत को पढ़ते हुए अपने आप को मैंवहां पाता हूंजहां तुम्हारे सिवाय कोई नहीं थान बंदिशें थींन हवा की सरसराहट थीन फूलों की खुशबू थीन मकरंद करालों की धमाचौकड़ी थी, जोचुपके से चुराना जानते हैं परागतितलियां भी कहीं नहीं दिख रही थींवैसे में ही हम कब आप से तुम हुए थेकिसी को भी नहीं मालूम मालूम भी हो तो कैसेऐसा होना स्वत: स्फूर्त थाकिसी साक्ष्य या किसी साक्षी की कोई भूमिका नहीं थीन कोई जुनून थान कोई सपने हीअपना था तो केवल तुम्हें तुम कहनाऔर तुम्हारा मेरे तुम को अपनानाआज तुम्हारे उसी खत को पुन: बार-बार पढ़ते हुए अपनेशब्दों को धार दे रहा हूं कि कैसेकिसी तड़पन और जकड़न में फूटती है वेदनाजो टिसती रहती है हरदम...।