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Written By WD

पिछली हर गंध को ...

गंध
कुमार रवीन्द्र
ND
पिछली हर गंध को
सहेज रही फूलवंती

केसरवन महका था
अंगों में उसके कल
खड़काई थी रघु ने
उसके मन की साँकल।

रघु के संग
सुख की थी सेज रही फूलवंती।

एक बरस खेत-पात
सूखे के भेंट हुए
घर-घर में
राजा के जालिम आखेट हुए।

रघु जूझा
तबसे निस्तेज रही फूलवंती।

घूम रही है अब वह
मुरझाई देह लिए
रात-रात उसने हैं
कितने ही ज़हर पिए
खत पिछले
सपनों को भेज रही फूलवंती।