New Poetry | ना जाने कब, पता नहीं कब
फाल्गुनी
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और केसरिया थे अरमान
ना जाने कब रंग हुए धुसर
और सांवला हुआ
मेरे आसमान का चांद,
सपने थे गुलाबी
और उम्मीदें थी सतरंगी
पता नहीं कब
उधड़े जब रंग तो
हर बात हुई बेरंगी
धानी-धानी प्यार भी
रानी रंग में संवरने लगा
नहीं पता कब और कैसे
एक रंग मायूसी का चढ़ा और
फिर 'उनका' हर ढंग बदलने लगा...
