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poem | नदी और नाव का संजोग

नदी और नाव
कुँअर उदयसिंह 'अनुज'
ND
बँट गए घर-बार और बँट गए लोग।
यही है नदी और नाव का संजोग।

आँगन में एक नई भीत है उग आई।
बड़े पास पिता रहे, छुटके पास माई।

बहनें अब लग रहीं जैसे कोई रोग।
यही है नदी और नाव का संजोग।

सींचे थे पिता ने जो मीठे-मीठे आम।
लिख गए हैं उन पर अब बेटों के नाम।

बहुएँ हैं लगा रहीं उँगली पर योग।
यही है नदी और नाव का संजोग।

ND
सहमकर दुबक गया मुस्कुराता बचपन।
यह आँगन राम का, उधर खेले लछमन।

बच्चों के हिस्से, अलगाव का वियोग।
यही है नदी और नाव का संजोग।

मन बँट गया और धन बँट गया।
प्रेम-घट में जल, बहुत घट गया।

अपनों को लूटते हैं, अपने ही लोग।
यही है नदी और नाव का संजोग।