तुम मेरे घर आकर देखो
ग़ज़ल
विलास पंडित'मुसाफिर' अपनी सोच बदल कर देखो वक्त के साथ ही चलकर देखो। ख़बर तो रखो दुनिया क्या है घर से जरा निकल कर देखो। प्यासों के कुछ काम ना आया क्या ऐ-खाक समंदर देखो। सारी बस्ती में मदहोशी है ? फूल के जैसा पैकर देखो। तंज़ ज़माने पर करते हो इक चिंगारी छू कर देखो। सारे मंज़र मिल जाएँगेतुम मेरे घर आकर देखो।