1. लाइफ स्‍टाइल
  2. »
  3. साहित्य
  4. »
  5. काव्य-संसार

जुम्मन चाचा की वह चाय

राजकुमार कुम्भज

राजकुमार कुम्भज
NDND
दिसंबर की नरम धूप सताती है

रह रह कर छब्बीस नवंबर की याद आती है

मगर दिन रात यह लगता रहता है

कि जीवन का पल-पल

संगीनों के साये में कटता है

परदा हटता तो है

मगर दिन-रात यही लगता रहता है

कि पृथ्वी का कोना-कोना

बुजदिलों की दहशत से काँपता है

पत्थर पर बारिश होती तो है

मगर, दिन-रात यही लगता रहता है

कि आकाश के हरेक सिरे से

NDND
खाने को मिल रहे हैं दहकते अंगारे

दिसंबर की सर्दी कुछ ऐसी ही है इस बार

हद हुई जाती है

कि पता नहीं कहाँ गायब है

जुम्मन चाचा की वह चाय

जो हर सर्दी में वर्दी बन जाती है !