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poem | कोई छू लें तो बिखर जाता हूँ

विलास पंडित
विलास पंडित 'मुसाफिर'
NDND
कोई गुलशन में आए तो डर जाता हूँ,
फूल हूँ मैं कोई छू लें तो बिखर जाता हूँ,

एक ही शब की सही जिन्दगी मेरी लेकिन,
खुश्बूएँ अपनी फिज़ाओं में तो भर जाता हूँ,

मेरा मालिक भी दुआ क्यूँ नहीं सुनता मेरी,
जबकि मंदिर में तो मैं शामो सहर जाता हूँ,

खुद-ब-खुद होते है हमराह मेरे गीत-ग़ज़ल,
वो खबर रखते हैं मैं हर रोज किधर जाता हूँ,

नेक तहज़ीब विरासत में मिली है मुझको,
उनकी बातों को मैं महसूस तो कर जाता हूँ।